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जगतहितकाऱणी
ने बुद्धि फेरके उनको कुछ का कुछ सुझा दिया है और सुझाते होंगे, सो कामरु देश के आदमी भी इन्हीं जाल में भूले हुए होंगे; सो उनको भी उनकी बुद्धि फेरके भैंरु या पीर का या वीर का या देवी वगैरा का सुझाते होंगे जिससे वोह भी भूले हुए होंगे, क्योंकि वोह जानते होंगे कि बमारे बस में देवी देवता है; सो हमारी करामात चलती है, सो बनियों ने यह कैसी अकलमंदी की है कि जब राजा बादशाह जाल को समझेंगे और दरियाफ्त करेंगे तो कामरु देश के भी मारे जावेंगे और दरियाफ्त के करने वाले यह जानेंगे कि जादू कामरु देश वालों का है, और डाकनियों के उपर और देवतों के उपर और भूत पलीत के उपर जीव मरवाने के लिए बदनामी लगादी है, परन्तु अकलमंदी बनियों की है और जाल तो बनियों का है और बदनामी और जात के उपर लगा दी है, भुलाकर; सो इस वास्ते यह अकलमंदी की है कि हमारा जाल प्रगट नहीं हो, इस सबब से मुलकों-2 में इन बनियों ने चोरों की तरह से खोज मालूम न होने के लिए मुलकों-2 में डाल दिए हैं, और संसार के लोग भूले हुए है- देवतों के भरोसे, और डाकनियों के और देवी-देवतां के भरोसे भूले हुए है और है राक्षसी पाप, और मुझको तो इन बनियों ने राक्षसी पाप से दुखी किया है जिससे इन्हों की चोरी मुझको मालूम हुई है, जिससे मैं आप लोगों को वाकिफ करता हूं और मेरे को नहीं कलपाया होता तो इस बात का क्या भेद मिलता! क्योंकि इन्होंने तो जाल के पड़दे डाल दिए है कि जो संसार को पता ही नहीं लगे, तो पाप किस तरह से मिटे ? परन्तु यह बनिये तमाम संसार को गारत करेंगे और सब विलायतों में थोड़े-से आदमी रहेंगे, जब यह बनिये अपना राज जाल ही जाल में कर लेंगे; जब तो कुल आदमियों की औलाद को बहुत दुख होगा, जो इन्हों का राक्षसी पाप नहीं छोड़ाओगे और बाजीगरों को भी भुलाए है संसार के मुवाफिक ही, और बाजीगर यह जानते है कि हमने किसी देवता की साधना की थी सो देवता बस में हो गया है, जिससे हामारा जादू चलता है। सो बाजीगरों को भी कुछ का कुछ सुझा देते है सो जादू से कामरु देश में भी जादते सुपने और नींद में सुपने करके तरह-2 के खेल जादू के दिखाते है, और डाकनें और चुड़ेलें सुझाते है, फिर इसी तरह से नजर का फैल संसार में जादू से चलाया है कि जो अच्छा मकान होवे तो गिर जावे या अच्छा घोड़ा होवे या अच्छा ऊँट होवे वोह मर जावे। इसी तरह से गाये, भैंस वगैरा अच्छा होवे तो मर जावे नजर के फैल से, और अच्छा नर नारी होवे तो वोह भी मर जावे; सो मारते तो कच्ची उमर में जादू से है और बदनामी देते है नजर की, और जिस तरह से कि आदमी तमाम संसार में जादू से भूले है, उसी तरह से कि जिसको नजर की बदनामी दी है, वोह भी यह जानते हैं कि मेरी नजर बहुत करड़ी है, और "आँखे तो नारायण ने देखने के वास्ते दी है; सो मालिक ने आँखें तो सब शरीर में अनमोल हीरा बनाई है, सो नजर किसी को किसी की नहीं लगती है, नजर कौनसी बरछी-भाला या गोली-तीर है जो लग जावे ?" यह तो नारायण ने देखने के वास्ते बनाई है, क्योंकि आँखें नहीं होवे तो शरीर किसी काम का नहीं है। इसी तरह 'छिंक' के उपर बदनामी दी है, क्योंकि बुरा तो करते है जादू से; इसी तरह से किसी को यह बात लगादी है कि आज सुबह को फलाने आदमी का मुँह देखा था, सो सारा दिन दुख पाया है, सो उस दिन उस शख्स के नाम के ग्रह जादू से कर देते है कि जिस शखस ने उस फलाने शख्स का मुँह देखा था जिससे वोह देखने वाला आदमी सारे दिन जादू के ग्रह से दुख पाता रहे, सो तो उसको मालूम नहीं कि मुझको जादू का ग्रह है जिससे दुख पाया है, क्योंकि मुँह के देखने से तो कुछ भी नहीं होता है क्योंकि 'आत्मा सो परमात्मा' और सब में परमेश्वर का रुप है। सो संसार में भी कहते हैं कि सब में 'पूरण ब्रह्म' है और सबके अन्दर मालिक की रोशनी है और कुदरत है, सो "सतजग में क्या मालिक दूसरा था ? और अब क्या दूसरा हो गया ?" मालिक तो वोह का वही है। सो सतजग में तो एक-2 को देखके जीते थे, और एक-2 पर बहुत हेत रखते थे, सो लगाये झाड़वनास्पति से और अनबोलों से और लगाए आदमियों से ऐसा संप और हेत था कि सब में परमेश्वर ही था, परन्तु जबसे इन बनियों बेईमानों ने ऐसा राक्षसी पाप चलाया है कि जो सबकी बुद्धि भ्रष्ट करके कुछ का कुछ संसार में वहम चला दिया है कि जिसकी कुछ गिनती भी नहीं हैं, अगर कुछ गिनती में आवे तो लिखूं, सो
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