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जगतहितकाऱणी
और जो बड़े शहर है वहाँ और ज्यादा बनाई हैं, परन्तु बूढ़ा-बूढ़ी होवें वोह तो तीर्थ सरुपी है। सो वेद शास्त्र में कहते हैं, सुनो इन बेचारों को डाकन-डाकियों की बदनामी दी है और तीर्थ सरुपियों को संसार के हाथों से मरवाते है कि जिन मुलकों में डाकनें बनाई है उन्हीं मुलकों के आदमियों के हाथों से मरवाते है, और डाकनियों के दिल में जादू से ऐसा सुझाते है कि हम डाकी-डाकनें ही है; सो बीमार तो करते है जादू से, और सुझाते है डाकनियों का, कि जिन्होंको डाकनियों की बदनामी दी है। सो डाकनियों का भी ब्रह्म बुद्धि फेरके राक्षसी पाप से कैद कर दिया है सो उनको यही सुझा देते हैं कि हम डाकनें हैं, क्योंकि जैसा संसार में नींद में खाने-पीने का सुपना करते हैं या और अनेक तरह की लड़ाई-भीड़ाई वगैरा का होता है; सो डाकनियों को भी सुपना उसी तरह से होता है, सो जबके डाकनियाँ बनाई है उनको भी जागता सुपना या नींद का सुपना करके सुझाते हैं कि हम डाकनें हैं, और आदमी को खा रही है इससे वोह भी यह जानने लगते हैं कि हम डाकी-डाकनियाँ और 'डायन' है, और संसार को जो सब मुलकों में सुपने हुआ करते हैं और आगे राक्षसी पाप नहीं था, तो सुपना भी नहीं होता था और जिस मुलक में कि बहुत-सी डाकनियाँ बनाई हैं और संसार के लोगों को जादू से बीमारी करें तो संसार के लोग यह कहने लगे कि आजकल डाकनियों ने बड़ा भारी फैल मचाया है, सो डाकनियों को और संसार के लोगों को बनिये जादू से ऐसा ही सुझावें कि हमको डाकन ने मारा है और डाकन भी यह समझे कि हमने ही मारा है, और सब संसार कहे कि अब तो अच्छे-2 आदमियों को खाने लगी है याने जिस-2 मुलक में डाकनें बनाई है उसी मुलक के आदमियों को जादू से सुझा दें कि अब तो अच्छे-अच्छे आदमियों को डाकनें खाने लगी है, जब उसी मुलक के आदमी, कि जिस मुलक में डाकनियाँ बनाई है उन डाकनियों को संसार के लोग हेत करके और पकड़ करके नीले कांटों में जलवा देते हैं और बहुतसियों को पिटवा के मरवा देते हैं। सो जबके डाकनों को अनेक तरह की तकलीफें करके संसार के हाथों से मरवा देते है, तो फिर यह बेईमान जानते हैं कि तीर्थ सरुपियों को संसार के हाथों से ही मरवाये है और गरीबों को बहुत दुख दिला दिया है तो फिर संसार के नामका पाप छोड़ देते हैं जब वोह अच्छे हो जाते हैं तो उस मुलक के आदमी, कि जिन मुलकों में डाकनों की बदनामी दी वोह यह कहने को लग जावें कि डाकनियों को मारा, जिससे अब दूसरी डाकनें डरने लगी है; सो अब दूसरी डाकनें अपने को नहीं खावेगी। और जबसे कि अंग्रेज आये है जबसे डाकनियों का फैल थोड़ा है और जब तक कि अंग्रेज नहीं आए थे जब तक इन्हों का फैल बहुत था, कि जिस मुलक में डाकनियों की बदनामी चलाई है उस मुलक के आदमियों को यह बनिये जादू से करोड़ों फैल करके मार देते हैं और सुझा देते हैं डाकनियों का। सो डाकनियाँ भी किसको बनाई हैं कि जो बनियों की जात के सिवाये दूसरी जातके हैं और ऐसी-ऐसी बुड्ढी डाकनें बनाई हैं कि जिनके मुँह में दाँत तक नहीं है, और बनाई भी उन्हीं के माँ, और दादी, और नानी, बुआ और मामी, काकी वगैरा को डाकनियों की बदनामी दी हैं। सो यह ख्याल करने की बात है कि यह तीर्थ सरुपी है, कि नहीं और बेटों के हाथों से डाकनियों की बदनामी लगाके मरवा देते है; सो यह बहुत बुरी बात है परन्तु डाकनियों के बेटे तो भूले हुए है वोह यह जानते हैं कि यह 'बिजनस' डाकने ही है, परन्तु डाकनें और भूत वगैरा तो कुछ भी नहीं है और झूठी बदनामी देके मरवा देते हैं; और वेद पुरानों में लिखा हुआ है कि रावण गरीबों को मरवाता था, परन्तु बनिये तो अपने पाप को खूब समझते हैं क्योंकि गरीबों को दुखी करेंगे तो आपसे ही संसार में बुरा हो जावेगा, इस वास्ते ऐसा पाप चलाया है सो बुड्ढे डोकरों को डाकनें बना के मरवाते हैं, सो क्या है ? गरीबों का मरवाना पाप है या नहीं, तो इसी तरह से बनिये भी रावण के मुवाफिक गरीबों को डाकनियों के बहाने से मरवाते हैं और कामरु देश का भी दुनिया के लोग कहते हैं कि वहाँ जादू बहुत है। सो कामरु देश मैंने अब तक देखा नहीं, अगर देखा होवे जब तो सब हाल वहाँ का लिख दूं, परन्तु सुनता हूँ कि वहाँ पर भी इन बनियों
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