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जगतहितकाऱणी
सो यह राक्षस विद्या का प्रगट पाप है। सो तुम हिन्दू-मुसलमान, अंग्रेज वगैरा को और तमाम जहान की खलकत को दिखता है और यह बनिये लोग तो पाप में समझते हैं जिससे ऐसा पाप चलाया है, क्योंकि झाड़ वनास्पति अपने को फल-फूल देते हैं सो वोह बेचारे बड़े करनी वाले और सती हैं जिससे इन बनियों ने राक्षस विद्या का पाप चलाया है, कि जो अगले सती लोग हुए थे तो देवता सरुपी कहलाते थे, परन्तु इन बनियों ने ऐसी अकलमंदी की है कि तमाम संसार के लोगों की अकल राक्षसी पाप से भ्रष्ट कर दी है, जिससे संसार के लोगों को दया-धर्म नहीं है; क्योंकि देवतों के नामका धर्म पुण्य करें तो ठीक है, क्योंकि तुम्हारे बाल-बच्चों के आड़े आवेगा और साधु-संत और फकीर-फुकरा और ब्राह्मणों वगैरा को देवतों के नाम का जीमण जिमाओ तो वोह धर्म का काम है और पुण्य है और देवतों की समाधियों के उपर जीव मारना पुण्य नहीं हैं, क्योंकि देवतों की समाधियों के उपर जीवड़ों को मराना बहुत बुरा पाप है। वोह तो जीते थे जब कीड़े के उपर भी दया पालते थे, परन्तु यह बेईमान ऐसे है कि जादू का पाप संसार के नामका कराके संसार को बीमार करते हैं और फिर देवतों वगैरा का सुझा देते हैं, जब संसार के लोग बेचारे लाचार होके देवतों के उपर जीव मारने लगते हैं और जब बनिये बेईमान संसार के नामका पाप छोड़ देते हैं तो वोह अच्छे हो जाते हैं, जब संसार को जादू से ऐसा ही सुझा देते हैं कि देवता ऐसा ही भोग माँगते है जिससे हमको बीमार किया था, और कभी जीव मारने से भी अच्छा नहीं होवे तो संसार को यह सुझा देवें कि देवतों ने पाड़ा और बकरा माना नहीं और बेईमान जिस-2 मुलक में जीव मरवाते हैं तो मेह बन्द करके देवतों के उपर जीव मरवा देते हैं और लोगों के दिल में ऐसा सुझा देते हैं कि अबके देवतों के उपर पाड़ा बकरा चढ़ाया नहीं जिससे मेह नहीं बरसा है। जब लोग गाँव-2 में जीव मारने लग जावें जब यह बनिये जमीन के नामका पाप करना छोड़ देवे तो फिर उन गाँवों में मेह बरस जाता है, और जो पाप करना जमीन के नामका नहीं छोड़े तो जीव मारने से भी नहीं बरसता, सो वोह जीव मराने को कब राजी हैं ? सो वोह तो मर गए सो वोह कहने के वास्ते कहाँ से आवें ? और दुनिया को यह खबर नहीं कि राक्षस विद्या के पाप से हमारी बुद्धि को कैद कर दी है जो हम नहीं समझते हैं, कि जो हमारे बुजर्ग पहले भक्त हो गुजरे हैं और उनको हम सब लोग मानते हैं, जिनकी समाधियों के उपर हमारी बुद्धि को राक्षसी पाप से फेर कर और हमारे हाथों से जीवड़ो को मरवाते हैं, सो यह तो बड़ा जुलम है। सो यह खबर नहीं क्योंकि वोह तो देवकला के भरोसे भूले हुए हैं सो संसार को और राजा बादशाह को कुछ दोष नहीं, कि इन्हों की राक्षस विद्या के पाप में बुद्धि कैद है जिससे बुरे कामों को ही अच्छा समझते हैं और आगे राजा रावण ने राक्षस विद्या का पाप चलाके सब ऋषिश्वरों की, और संसार की बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी; सो उसकी सजा रावण को और रावण की औलाद को मिली, सो रावण की तरह से इन बनियों के राक्षसी पाप को अपनी-2 औलाद बचने के लिए छोड़ाओ कि जैसे रावण वगैरा के पाप को छोड़ाया था, उसी तरह से छोड़ाओ। और जो मैं बार-2 रावण वगैरा का हाल लिखता हूँ सो तो राजा बादशाहों ने लड़ाइयाँ करके पाप को छोड़ाया था, सो यह बातें दुनिया में प्रगट है सो जब मैं रावण वगैरा का नाम लेता हूँ जब दुनिया यह कहती है कि हाँ, उन बेईमानों ने तो पाप चलाया था; सो जब दुनिया मानती है और कहती है कि बात तो सच्ची है, परन्तु कदीमी पाप तो बनियों के घर का है और रावण का नाम तो मैंने इस वास्ते लिखा है, और मैं संसार के लोगों से बनियों के जादू का कहता हूँ तो संसार कहता है कि जादू क्या चीज होती है ? हम तो जादू को मानते ही नहीं है। सो भाइयों ! तुम तो मानते भी नहीं हो और न पाप को समझते, परन्तु चाँद-सूरज को पाप लग जाता है यान ग्रहण कर देते हैं सो तुम सब संसार के लोग देखते हो सो तुमको ब्राह्मण लोग टीपणों में आए बरस छे-2 महीने पहले से सुनाते है, और "पाप तो चाँद और सूरज को, और जमीन माता व मेह को, व मौत को, व पवन पानी को लग
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