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जगतहितकाऱणी
और संसार के लोगों को ऐसी-ऐसी करतूतों से भुलाये है, कि भक्त लोगों को भी अपने जाल की खबर नहीं पड़ने देते और लोग यह ख्याल कहने से भी नहीं करते कि पाप बुरा है या भला है, और जो किसी साधु-फकीर को किसी देवता पर, किसी जानवर को मारते हुए देखकर दया आवे और गुस्सा होकर यह कहने लगे कि तुम तो अन्धे हो गए हो, कि जो देवतों के उपर जीव को मारते हो; सो तुम जीव को मत मारा करो, सो उस साधु को भी जादू से बीमार कर देते हैं और फिर साधु-फकीरों के दिल में भी इसी तरह से सुझाते हैं कि तुमने हमारे भोग को बंद करा दिया, और तुम साधु होके हम देवतों की निन्दा करते हो जिससे हमने तुमको बीमार किया है। सो इन बनियों ने साधु-फकीरों की बुद्धि ऐसी कैद कर दी है कि जो यह नहीं समझते हैं कि जो देवतों का सुझा दें तो साधु भी देवतों के उपर जीव मारना अच्छी बात जानते हैं और यह ख्याल में नहीं आता है कि रावण के मुवाफिक यह तो जादू का कुछ और ही छल है, सो यह तो कुछ और ही छल है सो ऐसा तो यह बनिये अपने राक्षसी पाप से नहीं समझने देते हैं और जादू से बीमार कर देते हैं जिससे साधु भी यह जानने लगते हैं कि देवता सच्चा है और मैं झूठा हूँ, जिससे देवतों ने बीमार किया है जिससे साधु भी देवतों के भरोसे से भूले हुए हैं। सो भुले तो बनियों के पाप से हैं, क्योंकि बनियों ने बुद्धि भ्रष्ट कर दी है सो देवतों का सुझा देते हैं तो उसी को सच मानने लगते है, और जो और किसी को सुझा देवे तो वोह भी मानने लगे, फिर इसी तरह से साधु भी भूलकर सच मानने को लग जाते है कि भूत-पलीत, देवी-देवता बड़ा है, सज जीव माँगता है; क्योंकि साधु-फकीरों को भी जादूचाला से बीमार कर देते हैं जब वोह जीव मराना सच समझते हैं और कहते हैं कि देवता के उपर जानवरों का देना दुरस्त है और मैं झूठा हूँ। सो उन्हों को यह बात मालूम नहीं है कि रावण की तरह से इन बनियों ने जादू चलाया है सो हकीकत में असल पाप इन बनियों का है, अगर बनियों के जादू की खबर संसार के लोगों को पड़ जाये तो संसार के लोग बनियों के घर में ही जीवड़ों को मारके डाल देवें, परन्तु संसार के लोगों को इनके जाल की मालूम नहीं है वोह तो देवकला के भरोसे भूले हुए हैं, क्योंकि रावण वगैरा देवतों के उपर जीवड़ों को मरवाता था, परन्तु जबके रावण के पाप की खबर पड़ी जब संसार के लोगों ने रावण, हरनाकुश वगैरा की औद ही निकाल दी थी। फिर रावण की तरह से इन बनियों का भी जाल चल रहा है, सो अब रावण की तरह से इन बनियों के जाल की खबर मुझतो पड़ी है, जिस तरह से कि पहले पाप के चलाने वालों को सजा दी गई है, उसी तरह से इन बनियों का भी पाप छोड़ाओ तो संसार का भला होवे। और रावण, हरनाकुश वगैरा ने तो थोड़ा पाप चलाया था, जिस पर ही उनकी तो औद निकाल दी थी और इन बनियों ने तो इतना पाप चलाया है कि जिसका कुछ अंदाज नहीं है, क्योंकि करोड़ों आदमियों को यह बनिये जादू के जुलम से मार देते हैं और नाम देवतों का लगा देते हैं, कि देवतों ने दोष किया है; जिससे मरे है। इसी तरह से करोड़ों जानवरों को अपने जादू से देवतों का नाम लगाके मरा देते है, सो तुम संसार के लोगों की बुद्धि राक्षसी पाप से भ्रष्ट कर दी है जिससे तुम देवतों के उपर अपने हाथ से जानवरों को मारते हो, सो यह राक्षस विद्या का पाप प्रगट है; सो तो जिस मुलक में देवतों के उपर जीव मराते हैं, सो तलाश करके देखो क्योंकि यह बात प्रगट है सो संसार को कुछ दोष नहीं है; क्योंकि संसार के लोगों को राक्षसी पाप से अन्धों की तरह पर कर दिए हैं सो वोह देवकला के ही भरोसे भूले हुए है। सो बनियों ने राक्षसी पाप से ऐसी बुद्धि खराब कर दी है कि जो उनको मने किया होवे तो लड़ने को लग जावें, सो यह जाल मिटेगा जब बुद्धि दुरस्त होगी; और अब तक तो बनिये लोगों ने बुद्धि खराब करके और इनके हाथों से जीवड़ों को मरवाके और उनके खाल की चीरें बारिक-2, नरम-2 दरखतों के डालियों में लपेटते हैं। सो जिस कदर कि खाल सूखती है उसी कदर दरखतों को दुख होता है, सो दरखतों में भी हम तुम आदमियों की तरह से जीव होता है जिससे वोह दरखत हरे रहते हैं और यह दरखत ऐसे सती है कि अपन सबको फल-फूल देते हैं, और इन दरखतों की लकड़ी काम में आती है; परन्तु इन बनियों ने अपने राक्षसी पाप से ऐसी अकल खराब कर दी है कि जिससे ऐसा ही सुझता है कि जैसा यह बनिये अपने राक्षसी पाप से सुझाते हैं,
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