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जगतहितकाऱणी
ऐसी-ऐसी बातें चला दी है कि "कलजग ऐसा आवेगा कि गाये का एक सींग भजेगा और एक सींग नहीं भिजेगा", सो देख लो कि अब ऐसा वक्त हैं कि एक खेत में मेह हो और उसके बराबर के खेत में होवे ही नहीं; सो जिस वक्त में यह जमाना आवेगा कि मेह से एक सिंग भिजेगा और एक नदी भिजेगा तो उस वक्त में क्या हालत होगी, सो जमीन का कलेजा और फैकड़ा और दिल के उपर रोग कराते हैं जब जमीन की नाड़े बंद हो जाती है, जब ऐसा मेह बरसता है कि एक खेत में बरसे और एक में नहीं बरसे; और उन जौरासी लाख कुण्डियों पे जो सर दुखने का पाप करावें तो सर दुखने को लगे और कलेजा-फैकड़ा और दिल और पेट दुखने का पाप करावें तो यह चीजें दुखने लगे, जैसे कि आदमी के पीड़ा होती है उसी तरह से जमीन के नाम का पाप करावें जब उसके भी पीड़ा होती है। इससे ही जमीन दुबली हो गई है जिससे सोने रुपे की खानें गल गई है और साओ देश मेह होवे तो वोह बरस अच्छा होता है जब यह जानना कि जमीन माता ने पानी अच्छी तरह से पीया, अगर साओ देश भी मेह हो जावे और आफरा बदहजमी का रोग जादू से कर देवें तो अनाज वगैरा गल जाता है, जब संसार के लोग कहते हैं कि खारे समुद्र का मेह बरसा हैं। इस तरह के किस्सा पहले से बनियो ने चला दिए हैं, सो संसार को खबर नहीं कि राक्षसी पाप से जमीन माता को रोग किये हैं और जबके आफरा बदहजमी की बिमारी होती है तो जमीन का आहार खारा पड़ जाता है कि जैसे आदमी बीमार होता है और बदहजमी से आहार खारा पड़ जाता है, और वोह आफरा बदहजमी की वजह से थोड़ा खाता है, उसी तरह से जब जमीन माता को बदहजमी का रोग कराते हैं कि जिससे अनाज वगैरा गल जाता है और फिर जमीन पर रोग की वजह से अनाज, मेवा मिष्टान वगैरा थोड़ा होता है; क्योंकि जमीन माता भी जीवता जीव है। सो जबके जमीन माता के नामका पाप कराते हैं जब जमीनमाता बीमार हो जाती है याने पाप के सबब से, और जो आदमियों के नामका पाप कराते हैं तो आदमियों को बीमारी हो जाती है और इसी तरह से सबको; और जो कि चाँदी-सोने की खानें संसार के लोग कहते हैं वोह जमीन माता के शरीर की चरबी है, सो जिस तरह से कि आदमी का शरीर है उसी तरह से जमीन माता का भी शरीर है, सो मैं क्या लिखूँ और क्या मेरी चतुराई, सो तुम हम सभी देखते है कि जो हम तुम सभी जीवाजून इस जमीन माता के पेटमें हैं, सो सबही देखते हैं सो जबके जमीन का पेट है तो शरीर भी है परन्तु इन बनियों बेईमानों ने राक्षसी पाप से सातों-आठों विलायतों के लोगों की बुद्धि कैद कर दी है, कि जैसे रावण ने तीन लोक की बुद्धि भ्रष्ट करके जमीन माता के शरीर की पहचान भुलादी थी, उसी तरह से इन बनियों ने भी तीन लोक की बुद्धि भ्रष्ट करके जमीन के शरीर की पहचान भुला दी है जिससे संसार के लोग सोने-चाँदी की खानों को भूल गए हैं। सो सब तक के मुझ गरीब साधु को इन बनियों ने अपने राक्षसी पाप से समामुख नहीं दुखी किया था जब तक तो मैं भी संसार के लोगों की तरह से अन्धा बना था, परन्तु जबकि इन सौदागरांन ने अपने राक्षसी पाप से समामुख कलपाया कि जहाँ पर यह बनिये अलोप पाप कराते हैं, सो वहाँ पर जमीन के नामका पाप कराते हैं और जीवाजून के नामका कराते हैं, सो जबसे कि मुझको कलपाया है जब मैं समझा कि जमीन माता का भी शरीर है और 'जमीन जीवता जीव' है; सो "जमीन माता के शरीर में पहाड़ जो है वोह हा़ड़ है, और मिट्टी जो है वोह गोस्त है, और चाँदी-सोने की खानें जो है वोह चरबी है, और जो कि बड़ें-2 दरियाव है वोह जमीन के शरीर की आंतड़िया है, और जो छोटे-2 नदी-नाले हैं वोह जमीन माता के शरीर की नाड़ें है, और जो रत्नागर सागर और सात सायर है वोह जमीन माता के शरीर की ओझड़ी है" सो जब के मेह बरसता है जब जमीनमाता जल का आहार करती है तो जल आंतड़ियों के रास्ते होके ओझड़ी में जाता हैं जब जमीनमाता जल का आहार करती है; और जबसे कि यह बनिये लोग काल पड़ाने लगे हैं जबसे जमीनमाता बीमारी के सबब से दुबली हो गई है इससे जमीन माता के उपर धन नहीं रहा है और ना किसी को दिखता है। इस वास्ते कि टूटा हुआ धन बनियों ने पहले से काबू में कर लिया है जिससे राजा बादशाह भी दुनिया के उपर लोभ करने को लग गये हैं और सब संसार भूखा होने की वजह से चोर
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