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जगतहितकाऱणी
सो स्वर्ग के भरोसे से भुलाते है सो यह बात तुमे आँखों से तो नहीं देखी, पर्तु कानों से स्वर्ग-नर्क की शोभा सुनते हो कि जैसे जीवड़ों को सजा देते हैं। सो उसके दुख की शोभा सभी हिन्दू-मुसलमान के लोगों तुम सुनते हो सो इस किताब के देखने से तुम सब वाकिफ होकर जाल को छोड़ाओ, और यह बनिये थोड़ा बहुत राक्षसी पाप तुमको छोड़के भुला देवेंगे सो आगे भी राजा बादशाहों को इन काफिरों ने भुलाये, कहते हैं और अब मेरे जीतेजी नहीं छोड़ाओगे जब तो संसार को भुलावेंगे, क्योंकि इन बनियों बेईमानों का दिल मेरे जीतेजी पाप छोड़ने का नहीं है, क्योंकि यह संसार को गारत करके अपना राज किया चाहते हैं। इससे दुनिया में बु्धि भ्रष्ट करके मुझ साधु को संसार के नजदीक पागल सुझाते हैं, सो इन बनियों की गर्ज यह है कि जो साधु के जीतेजी राक्षसी पाप को संसार के लोगों ने हेत करके छोड़ा दिया जब तो छूट जावेगा, क्योंकि यह साधु हम बनियों से पाप को छुड़वा देगा; क्योंकि साधु को समामुख दुखी किया है इससे मालूम पड़ा है, इससे संसार के लोगों की बुद्धि भ्रष्ट करते हैं और समझने नहीं देते हैं। फिर मैं अकेला क्या करूँ, क्या अपना सर फोडूं? मैं तो दुनिया के वास्ते दुख पाके शरीर से भी ना ताकत हो गया हूँ और बनिये बेईमान दुनिया को सुझाते हैं बावला। सो दुनिया को क्या दोष, वोह तो काफिरी पाप से संसार को बावला सुझाते हैं; सो दुनिया को क्या दोष? सो मेरी जान में तो दुनिया बावली और दुनिया के जानने में, मैं बावला। सो मेरे को तो ऐसा दुख हो रहा है, सो दुनिया नहीं समझती है इससे मैं निहायत ही हैरान हूँ कि जो दुनिया नहीं समझेगी तो यह जाल किस तरह से छूटेगा, इससे दुख पा रहा हूँ और संसार के नजदीक मुझ गरीब साधु को बावला सुझाते हैं, और जिन-जिन गरीबों ने आगे राक्षसी पाप को दुख पा-पा के संसार के उभरने के वास्ते पकड़ा है, और संसार ने वाकिफ हो-हो के राक्षसी पाप को छोड़ाया है जिसका गुण संसार के लोग अब तक जानते हैं, कि जिन्होंने राक्षसी पाप को प्रगट किया और फिर संसार ने छोड़ाया और रावण, हरनाकुश और कंश, कारून बादशाह ने राक्षसी पाप से थोड़ी बुद्धि भ्रष्ट की थी जिससे संसार के लोग जल्दी समझ गए थे, परन्तु इन बनियों ने अपने राक्षसी पाप से संसार के लोगों की और राजा बादशाहों की ऐसी बुद्धि भ्रष्ट कर दी है कि जो समझाने से भी नहीं समझते हैं, कि राक्षसी पाप से हमारी औलाद को गारत कर देंगे। जो पाप को नहीं छोड़ावेंगे तो बगैर छुड़ाये के कैसे उभरेंगे? क्योंकि जिसको तुम स्वर्ग-नर्क कहते हो, वोह बनियों के घर का अलोप पाप है और स्वर्ग-नर्क तो यह जमीन माता ही है, सो सारी सृष्टि स्वर्ग में ही बसती है; और खेती-बाड़ी का पाप भी जबसे चला है जबसे बनिये राक्षसी पाप से काल पड़ाते हैं जब रिजक वगैरा थोड़ा रहा है और थोड़ा होता है, जबसे खेती-बाड़ी का पाप चलाया है और जब तक कि राक्षसी पाप नहीं चला था तो काल भी नहीं पड़ती था, क्योंकि बरसात होने से आप ही तरह-2 के मेवा मिष्टान रिजक वनास्पति वगैरा हो जाती थी, क्योंकि सब जल ही की माया है और जल ही सबका बीज है और जब बनिये काल पड़ाते हैं, जब जमीन बीमार होती है और काल नहीं पडा़वे तो जमीन माता को सर्द-गर्म का रोग करके बीमार कर देते हैं तो मेवा मिष्टान वनास्पति वगैरा गल जाती है, और जब मेह बरसता है जब जमीन माता पानी पीती है जैसे कि आदमी खाना-पीना खाता-पीता है जब सारे शरीर में और अंग-2 में असर पहुँचता है जब देह हरी रहती है। इसी तरह से जमीन माता का भी आदमी के मुवाफिक शरीर है, जब साओ देश में मेह होता है जब जमीन का भी शरीर हरा और ताजा रहता है; सो ऐसी बिरखा जब होती थी कि जब यह बनिये महाजन काल नहीं पड़ाते थे और अब तो बिरखा का ऐसा हाल है कि दस गाँव में होवे और बीस गाँव में नहीं होवे, याने एक परगने में बारिस होवे और दूसरे में नहीं, सो यह जादू से ऐसी बिरखा होने देते हैं। सो यह जमीन के नाम का पाप कराते हैं जिससे जमीन की नाड़े जादू से बंद हो जाती है, सो जिधर बंद हो जावे उधर बरसे नहीं; और जिधर रोग नहीं होवे उधर मेह बरसता है, और पहले से इन्होंने
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