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जगतहितकाऱणी
उसका लेखा बनियों को ही है। याने गुप्ती पाप का कि जो गुप्ती पाप में जितनी कुलें काम आती है जिसकी शोभा दुिया में चलाई है कि, मालिक चौरासी लाख जू भुगताता है, सो संसार भी सुनने से ऐसा जाने लगता है कि इती जून होगी और इतनी ही भुगतनी पड़ती है। सो भुगती तो क्या पड़ती होंगी यह बियों ने राक्षसी पाप चलाया है और इन्होंने भूल डालने के वास्ते ऐसे किस्से चला दिए हैं और पैदा तो सब अपनी-2 औद से होते है सो सबको दिखता है परन्तु यह चौरासी लाख कुण्डियों के उपर चौरासी लाख जीवाजून को कलपाते हैं और उनका दुनिया में लेखा चलाया है सो सबकी कुल के पीछे कुण्डियाँ न्यारी-2 है और चौरासी लाख जीवाजून से कुलें बहुत हैं, सो सब संसार इस का सुभार करें तो शुभार तक नहीं होवें क्योंकि जीवाजून का कुछ अंदाज नहीं, क्योंकि आदमी और अनबोला और चौपाया और पंखेरू वगैरा और रिजक घास वनास्पति भी जून में गिनी जाती है, इसी वजह से जूनों का हिसाब नहीं हो सकता है, जो चौरासी लाख कुण्डियों के उपर चौरासी लाख जीवाजून को कलपाते है, सो इसका हिसाब-किताब बनियों के घऱ में हैं, सो चौरासी लाख जीवाजून के कुलों को कलपाते हैं और मारते हैं। सो वोह पाप तो बनियों के कब्जे में है, सो किसी को नहीं दिखाते हैं, परन्तु इन बनियों के पाप की तो मुझको इस तरह से खबर पड़ी है कि, जैसे शनिचर को रावण के जाल की खबर पड़ी थी क्योंकि रावण ने शनिचर को अपने राक्षसी पाप से समामुख कलपाया था, जब खबर पड़ी थी, सो अब इन बियों नेन मुझको भी अपने राक्षसी पाप से शनिचर की तरह से समामुख कलपाया है और कलपाते हैं, जिससे बनियों के जाल की मुझको खबर पड़ी, सो तुम हु्दु-मुसलमान, अंग्रेज सब ही सूनते हो और कहते हो कि वहा पर नारगी की कुण्डि़या हैं, सो गुप्ती पाप हैं। सो इन बनियों ने भी रावण की तरह से राक्षसी पाप का स्वर्ग बनाया है, सो मुझको राक्षसी पाप से दुखी किया है और जहाँ कि गुप्ती पाप करते हैं वहाँ पर मेरे नाम की जीवाजून को दुखी करते हैं जिससे मेरा भी ब्रह्म दुखी हुआ है, सो मैं बनियों के पाप को प्रगट करता हूँ कि रावण ने देवता सरूपियों की बुद्धि राक्,सी पाप से भ्रष्ट की थी, सो उसका सबूत वेद शास्त्र में और किताबों और पुरानों में लिखा हुआ है इससे जाहिर होता है। सो जबकि शनिचर को दुखी किया जब शनिचर ने सेती लोगों को और राजा बादशाहों को वाकिफ किया, जब उन्हों की आँखें खूली वरना दुनिया को तो ऐसा ही सुझता था कि रावण बड़ा भक्त है, सो रावण ने दुनिया की ऐसी बुद्धि भ्रष्ट की थी, सो इन बनियों ने रावण से भी ज्यादा लोगों की बुद्धि ऐशी भ्रष्ट कर दी है जिससे ऐसा ही समझते हैं कि जहाँ बनिये नहीं वहाँ राज नहीं और बनिये तो माई-बाप है और जो खेती-बाड़ी करके और कमाके राजा बादशाहों को देते हैं सो जिनकी तो बेचारों की कुछ गिनती ही नहीं हैं और जो कि दूसरी विलायतों के लोगों से मिल के मरवाते हैं जिसका कुछ पता भी नहीं लगने देते हैं और प्यारे हो-हो के सबसे हिले मिले रहते हैं। सो दूसरी विलायतों का भी धन ले लेने की गर्ज से हिन्दुस्तान के हिन्दू-मुसलमान को मराते हैं, सो जब उनका भी धन काबू में कर लेंगे जब उनको भी आपस में लड़ा के मरा देंगे और जब थोड़े से आदमी रहेंगे और बनियों की जात ज्यादा रह जावेगी, जब बनिये अपना राज करेंगे सो जब सातों-आठों विलायतें गारत हो जावेगी और सबका धन काबू में कर लेंगे जब इन बनियों का ही राज हो जावेगा जिससे यह पाप हिन्दुस्तान में बनियों ने बलराजा के बाद से चलाया है, कि जो दिल्ली मण्डल से याने हिन्दुस्तान से उठकर दरियाओं के पार चले गए हैं और हिन्दु-मुसलमान के बच्चे कि जो हिन्दुस्तान में है उनको यह बनिये अपने रकाषसी पाप से मराते हैं और आप गरीब हो के और दूसरी बादशाहतों से मिलकर मराते हैं। सो दूसरी बादशाहतों के लोगों को खबर नहीं कि इन बनियों ने रावण के मुवाफिक चार कूंट में राज करने के वास्ते जाल चलाया है, इस वास्ते हम दूसरी विलायतों के लोगों को हिन्दुस्तान का लोभ बताके हिन्दुस्तान के लोगों को मरवाते हैं और हमको हिन्दुस्तान के लोभ में डालके हमारी विलायतों के गली कूंचों को देखते हैं और वाकिफ होते हैं।
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