और सिवाणा के और जालौरी के भाकरों में भागता फिरता और आदमियों को नहीं मिलता था और ना उनको अपने पास आने देता, अगर मेरे पास आदमी आता तो मैं भाग के चला जाता और 'दबक' जाता। सो संसार के लोगों से दरियाफ्त करो तो वोही लोग कह देंगे कि "जिनको देखके मैं भागता था कि यह साधु वहाँ-2 भागता फिरता था और आदमियों से बात नहीं करता था और जंगल में ही रहता था, जब मुझको पन्द्रह या बीस दिन भूखे मरते और प्यासे मरते हो जाते और यह जानता कि अब मेरी जान निकल जावेगी, जब यह बेईमान जादू से कृष्ण महाराज का चहरा सुझाते।" जब मुझको ऐसा मालूम होता कि कृष्ण महाराज मेरे पास खड़े हैं सो कृष्णजी का चहरा मुझको तरह-2 का सुझाते थे, सो कभी तो विकराल रुप और कभी और तरह का; सो जबके विकराल रुप सुझाते थे, सो किस तरह का सुझाते थे कि कृष्ण महाराज गाये का गोस्त अपने कंधे के उपर उठाए खड़े हैं और मेरे से यह दरियाफ्त करते हैं कि तूं इस जगह पर क्यों पड़ा हैं ? सो जबके मैं कृष्णजी का सरुप ऐसा देखता तो कहता कि ऐसा अपराधी आदमी कौन खड़ा है गाये का गोस्त लिए ? और मैं हिन्दू हूँ, जब मैं उससे गुस्सा होकर कहता कि तुम चले जाओ, जब वोह कहता कि तेरी जान तो निकलने को हुई है और तूं भूखा-प्यासा यहाँ क्यों पड़ा है ? जब मैं ज्यादा गुस्सा होकर यह कहता कि तुम चले जाओ तुम हमारे पास क्या पूछते हो ? जब फिर वोह मुझे पूछता कि तूं क्यों पड़ा है ? जब मैं फिर गुस्सा होकर कहता कि तू अपराधी क्या मुझको गाये का गोस्त देवेगा ? सो यह चीज तो मुझ हिन्दू के नजदीक भिष्टा के बराबर है, और मैं तो यूं ही पड़ा हूँ तुम चले जाओ, तुमको क्या काम है ? जब न मालूम कि गाये का गोस्त तो कहाँ अलोप हो गया; सो इन बनियों बेईमानों ने राक्षसी पाप कृष्णजी के नामका कराके कृष्णजी का चहरा सुझा दिया और इसी तरह से चारभुजा और मोर-मुकट और गोपियाँ वगैरा भी जादू से उसी वक्त सुझा दी। सो जैसे नींद में सुपना होता है उसी तरह से वोह जागता सुपना था और बहुत आदमियों को दुनिया में जागता सुपना किसी को भूत का और किसी को देवतों का कराते होंगे; सो वोह कुल तमाम जागता सुपना है क्योंकि ऐसा बुरा पाप है कि मरे हुओं का पाप से चहरा सुझा देते हैं, सो "खैर कृष्ण महाराज तो मुझको क्या सुझते, परन्तु बनिये जो राक्षसी पाप कराते हैं, जिससे बनियों का राक्षसी पाप कृष्ण का चहरा होके सुझता था।" उसी तरह से और भक्तों के नामका पाप कराते हैं तो उनका चहरा होके सुझता है कि जिस-2 के नामका पाप करावें उसी का चहरा दिखे। जब कृष्ण महाराज कहने लगे कि माँग क्या माँगता है ? जब मैंने कृष्णजी से सीधे भाव कहा कि "दुनिया में काल पड़ता है इससे सारी सृष्टि दुखी है, सो एक तो काल दुनिया में नहीं पड़े, और दूसरा कच्ची उम्र में कोई नहीं मरे, और तीसरा रोगचाला वगैरा सृष्टि में नहीं होवें, और चौथा सतजग की तरह से सब गरीबों-अमीरों के पास द्रव्य और माया होवे, और कोई भूखे नहीं मरे, और सतजग की तरह से अमन अमांन रहे, और सतजग की तरह से सबकी बुद्धि दुरस्त रहे और किसी में खार-ऐंखार नहीं रहे।" सो मैं तो संसार के वास्ते कहता हूँ और सब सुखी होवे तो उपकार होवे, वोह उपकार है; जब इतनी बात सुनकर कहा कि "तुमको क्या काम है संसार मर जावे तो तुझको क्या और रह जावे तो तुझको क्या ?" जब मैंने कहा कि "संसार मर जावेगा जब आपका भी नाम कौन लेवेगा !" जब कृष्ण महाराज ने कहा कि "संसार तो महा दुष्ट है, तूं माँग, जो तुझको माँगना हो" जब मैंने कहा कि "मैंने संसार में से निकलके अपना घर ही छोड़ दिया, सो अब मैं क्या माँगू ?" मेरे तो जीवका भला होना चाहिए, मुझको कुछ धन नहीं चाहिए, और तुम परमेश्वर कहलाते हो और संसार कहता है कि हमारी बुद्धि परमेश्वर ने भ्रष्ट कर दी है सो संसार को तो कुछ दोष नहीं, वोह तो कहते हैं कि हमारी परमेश्वर ने बुद्धि भ्रष्ट की है सो आप परमेश्वर हो, सतजग में तो संसार की बुद्धि तुमने अच्छी तरह से रहने दी थी और अब तुमने भ्रष्ट की है सो अब तुम्हारे हाथ क्या आता है ? सो बुद्धि भ्रष्ट होने से तो गरीब-गुरबा दुखी होते हैं और गरीबों का तो तारने वाला परमेश्वर होता है; सो अब गरीबों को ऐसा दुख नहीं देना चाहिए, इतनी मेरे उपर कृपा करो; क्योंकि |