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जगतहितकाऱणी
है; परन्तु यह बेईमान ऐसा समझते है कि हकीम, वैद्य, डॉक्टर दवा करके किसी को भी कच्ची उमर में नहीं मरने देवेंगे, तो फिर पाप कराके ऐसे् करते हैं कि उनकी दवा से और इलाज से किसी को आराम नहीं होने देते हैं; और जब यह बेईमान सब देशों में मरी बीमारी वगैरा डालते हैं तो फिर तो किसी-2 को ही इलाज से आराम होने देते हैं कि जिसके नाम का पाप नहीं कराते हैं, वरना बहुत से लोगों को जादू से मार देते हैं और फिर संसार में यह कहने को लग जाते हैं कि हकीमों व वैद्यों व डॉक्टरों की दवाइयों से और इलाज वगैरा से कुछ नहीं होता है। सो इस बात की हकीमों और डॉक्टरों को बिलकुल खबर नहीं है कि जिन-2 दवाओं से पहले आराम होते थे, अब क्यों नहीं होते हैं ? सो ऐसी बातों को सोचनी चाहिए कि दवा तो वोह की वहीं है फिर अब आराम क्यों नहीं होता है? परन्तु महाजन लोग रावण के मुवाफिक अपने राक्षसी पाप से दवा और इलाज नहीं चलने देते है। सो ऐसे पाप की हकीम और डॉक्टरों को बिलकुल खबर नहीं कि रावण के मुवाफिक पाप से दवा नहीं चलने देते हैं, तो यह बेईमान हकीमों और डॉक्टरों की रोटी भी खो देंगे; क्योंकि यह बेईमान जादू से दवा चलने भी नहीं देते है क्योंकि यह समझते हैं कि जो हकीमों और डॉक्टरों के इलाजों से लोगों को आराम होता रहेगा तो संसार किस तरह से ओछा होगा और बहुत कम घटेगा, क्योंकि जब संसार कम होगा जब ही हमारा कुल बिलायतों में राज होगा, इससे दवा वगैरा नहीं चलने देते हैं; सो भाई मेरे, अमर तो कोई नहीं है, बुड्ढे होकर तो सब ही मरते हैं परन्तु यह बेईमान संसार की कुल कम होने के वास्ते जादू से कच्ची उमर में मारते हैं, इससे मैं लिखकर तुम संसार के लोगों को वाकिफ करता हूँ कि जिनके नाम का जहाँ गुप्ती पाप कराते हैं तो मरने के जितना पाप करावें जब उशको वोह दवाईयाँ देने से भी आराम नहीं होता है, चाहे कुछ दवाये दो; क्योंकि डॉक्टर-हकीम तो एक दवा दें और यह केई रोग शरीर में कर देते हैं, और जिनका जितना मरने का पाप नहीं करें याने पाप उसके नाम का छोड़ देवें तो वोह बच जाते हैं। सो यह भी दुनिया के डरते हुए कि संसार को मालूम हमारे जाल की नहीं होवे जिससे थोड़े बहुतों को आराम दवा से होने देते है, वरना यह तो गारत करना ही चाहते हैं याने संसार कम हो जावे और जब इनके जाल की संसार में भूल पड़ जावेगी तो यह संसार को बहुत कम कर देंगे और बुद्धि भी भ्रष्ट कर देवेंगे जब तो किसी को बिलकुल समझने नहीं देवेंगे। इस वास्ते अब मैं समझाता हूँ तो कोई मुझको पागल कहते हैं और कोई कहते हैं कि सिरड़ी हो गया है, जिससे बनिये ही बनिये पुकारता है, सो संसार को कुछ दोष नहीं है यह तो संसार को जादू के जुलम से मुझको पागल ही सुझाते हैं, सो इनकी गर्ज यह है कि "जहाँ गुप्ती पाप कराते है वहाँ पर कागज भेजकर यह समाचार लिख भेजते है कि राजा बादशाह के नामका पाप या गरीब-गुरबों के नामका पाप कराओ सो सबकी बुद्धि भ्रष्ट हो जावे।" सो साध अनोपदास की बात को कोई नहीं समझें और यह कहते हैं कि आप ही कुकते-2 और बकतेर मर जावेगा, सो फिर अपने जाल को कोई नहीं छोड़ावेगा, क्योंकि दूसरों को भेद नहीं; और मेरे को तो इन्होंने दुखी किया है जब इन्हों के जाल का भेद मुझको मिला है परन्तु रावण ने तो थोड़ी बुद्धि भ्रष्ट की थी। सो शनिचर के समझाने से संसार के लोग फौरन समझ गए, परन्तु इन बनियों ने संसार के नामका पाप कराके सबकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी है सो समझाने से भी नहीं समझते हैं, और जिस किसी के नाम का थोड़ा पाप किया है सो वोह थोड़ा समझते हैं और कहते हैं कि जो बात साध-अनोपदास कहते हैं वोह दुरश्त है, क्योंकि पहले भी इसी तरह से रावण वगैरा ने राक्षसी पाप चलाया था और बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी, उसी तरह से अब भी हो रहा है क्योंकि जो साध अनोपदास कहते हैं वोह सच है; क्योंकि आगे रावण भी कच्ची उमर में मारता था और धन को, और मेह, और मौत को, कब्जे में कर लिया था। सो मैं जिन लोगों को बनियों के जाल की वाकिफ करता हूँ और समझाता हूँ तो थोड़ा बहुत समझते हैं, परन्तु कुल को नहीं समझते हैं और ना उनको कुल जाल की खबर पड़ती है कियोंकि उनको समामुख दुखी नहीं करते हैं इससे इनको इन्हों के जाल की खबर पड़े, सो जाल की तो उन्हों को किस तरह खबर पड़े ! परन्तु जिस कदर मैं मुँह जबानी कहूँ वोह याद रखे, और संसार में चर्चा करते रहें कि जो बाबा कहता है उसका बन्दोवस्त करो तो ठीक है और सब उभर जावें
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