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जगतहितकाऱणी
उशी तरह से सदा उगता था। सो संसार में कहते है कि सतजग में चन्द्रमा सदा पूरा उघताथा, सो जबसे चन्द्रमा के नाम का पाप कराना शुरु किया है तो वदी एकम से चन्द्रमा के नाम का पाप करना शुरु करते हैं तो अमावश तक पन्द्रह दिन पाप इस तरह से कराते है, कि वदी एकम को तो थोड़ा पाप करके चन्द्रमा को थोड़ा-सा घटाते हैं, फिर दूज को एकम से ज्यादा पाप कराके कुछ ज्यादा घटाते हैं, फिर दूज से ज्यादा तीज को पाप कराते है, जब चंद्रमा और ज्यादा घटता है फिर तीज से ज्यादा चौथ को पाप कराते है जब चंद्रमा और ज्यादा घटता है और चौथ से पांचम को ज्यादा पाप कराते है तो और ज्यादा घटता है। इसी तरह से वदी पुख में पन्द्रह दिन तक याने अमावश तक दिन-2 ज्यादा चन्द्रमा के नाम का पाप कराते हैं तो अमावश को इस कदर पाप चन्द्रमा के नामका कराते है कि बिलकुल नहीं लगता है, और चन्द्रमा घटते-घटते अमावश तक अंधेरी रात साफ हो जाती है, और फिर एकम से पाप करना थोड़ा-थोड़ा छोड़ते जाते हैं, तो फिर चन्द्रमा बढ़ता जाता है तो सुदी एकम को थोड़ा पाप छोड़ते है तो चंद्रमा थोड़ा-सा बढ़ता है और दूज से पाप ज्यादा छोड़ते है तो दिखने लगता है और इसी तरह से दिन-दिन पाप कम करते जाते है, तो दिन-दिन चन्द्रमा बढ़ता जाता है, तो पूनम तक चन्द्रमा पूरा होता है तो पूनम को चन्द्रमा के नाम का पाप बिलकुल छोड़ देते हैं जब पूरी ज्योत चन्द्रमा की होती है; और जो उसमें भी ग्रहण वगैरा डाल देवें, तो आधा पाप करावें तो आधा चन्द्रमा घटता है और जो ज्यादा पाप करावें तो जियादा कम दिखता है। सो यह रोग ऐसा है कि जैसे आदमी को ‘‘आधासीसी’’ का रोग होता है और सर दुखता है, इसी तरह से जमीन माता को यह आधा सीसी का रोग जादू से किया है, कि चन्द्रमा को घटाते हैं; सो यह रोग आधासीसी का बारह महीना रखते हैं, एक फक्त पूनम के दिन नहीं कराते हैं, सो पूरा उगता है और दुिया में किस्सा पहले से इस तरह से संसार में चला दिए है कि ‘‘अन्धेरी रात चोरों ने माँगी है और सासू की बहु ने माँगी है’’ सो अनेक किस्सा इस तरह के चला दिए हैं। सो यह बनिये सूरज-चन्द्रमा को ऐसे ग्रह कराते हैं जैसे रावण सूरज-चन्द्रमा को ग्रह कराता था, उसी तरह अब भी ग्रहण वगैरा पड़ता है और चन्द्रमा वगैरा घटता है; सो टीपणों में सब लिखा हुआ है कि इस कदर कला चन्द्रमा की घटी-बढ़ी है और बारह महीना पेश्तर से ही सूरज-चन्द्रमा का ग्रहण बतला देते हैं और इसी तरह से रावण ने भी ग्रह वगैरा के टीपणे चलाए थे कि जैसे अब महाजनांन के टीपणे चलाए हुए, रावण के मुवाफिक मौजूद है। सो जब यह काफरी पाप दफे होगा जब सतजग की तरह, सदा पूरा चन्द्रमा उगेगा; और यह खाली बादल जो होते है और दस-2 और पन्द्रह-2 दिन रहते हैं और मेह नहीं बरसता है और उससे आदमियों को बीमारी होती है और खेतों को नुकसान होता है, सो यह अक्सर जमीन को रोग है कि जैसे आदमी को ‘‘गुजराती’’ का रोग होता है और वादी से सब बदन अकड़ जाता है और पसली में दरद होता है, इसी तरह से जमीन को खाली बादलों का रोग होता है, इसी वजह से अनाज वगैरा को ‘रोली गेरु’ हो जाता है और नुकसान होता है। सो टीपणों में पहले से सुना देते हैं कि ‘गेरू’ और ‘दाय’ वगैरा पड़ेगा, जिससे धान और झाड़ वनास्पति वगैरा जल जावेगी, सो जब पाप जमीन के नाम का कराते हैं तो जल जाते हैं; सो ऐसे-2 अनेक तरह के रोग जमीन को करा दिए हैं जब से दुबली हो गई है, इससे खानें चाँदी-सोने की गल गई है जिससे दिखती नहीं है, कि जो जमीन माता को लाख तरह का रोग करा देवें तो कोई यह नहीं समझें कि जमीन को रोग किया है बलके यह जानने लगते हैं कि परमेश्वर की कुदरत है; और जो कि आदमी को सरद-गरम का रोग हो आवे तो उसका शरीर और जीव बहुत दुख पाता है और जबकि जमीन माता को दुख और रोग करते हैं तो जमीन माता का जीव और शरीर दुख पाता है, परन्तु संसार के लोगों की बुद्धि ऐसी कैद कर दी है कि जो राक्षसी पाप से जमीन को फाड़ भी देवें और दरखतों को हवा के जोर से गिरा भी देवें या समुद्र के पानीको रोग करके ‘आफरा’ और ‘बदहजमी’ कर देते हैं तो उसको सब संसार के लोग ईश्वर की कुदरत कहते है, परन्तु यह कोई नहीं जानता कि जमीन तो जिंदा जीव है परन्तु
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