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जगतहितकाऱणी
जिसकी तारिफ यह है कि जो जमीन के शरीर में कंचन है वोह तो सोना है, और कंचन से उतरा हुआ है वोह ताम्बा, पीत्तल, लोहा, जस्ता, रांगा वगैरा है, और जिसको कि तुम ‘रसकोपका’ कहते हो वोह जमीन माता के शरीर की ‘मनी’ और ‘मद’ है कि जिस तरह से आदमी के शरीर में राजा वगैरा होता है, उसी तरह से जमीन माता का राजा वगैरा है; परन्तु राक्षसी पाप के सबब से दुख पा रही है, इससे जमीन माता के शरीर में ताकत नहीं रही है, सो जबकि जमीन माता के शरीर की बीमारी जाती रहेगी जब जमीन माता ताजा और तैयार हो जावेगी, जब कुल विलायतों में पीछा धन प्रगट हो जावेगा कि जैसा सतजग में था । सो तुम संसार के लोगों और राजा बादशाह एक दिल होके इन बनियों के राक्षसी पाप को छोड़ाओ ताकि फिर चाँदी-सोने की खानें और टूटा हुआ धन हो जावें, और किसी विलायत में धन की भूख नहीं रहवे; क्योंकि जब इन सौदागर बच्चों का राक्षसी पाप दफे हो जावे जब किसी विलायत में धन का टोटा नहीं रहेगा और वैसा ही हो जावेगा कि जैसा ठाट और पाट सोने-चाँदी का सतजग में था, अगरचे यह बनिये टूटे हुए धन का लोभ देवें तो इन्हों के लोभ में मत आना, क्योंकि यह बनिये तुमको टूटा हुआ धन देके भुला देंगे और जो कि कदीमी धन था उसको अपने पास रखेंगे और जो कि तुमको टूटा हुआ धन देंगे वोह भी पीढ़ी, दो पीढ़ी के बाद भुला के और अकल को फेरके ले लेवेंगे, परन्तु तुम संसार के लोगों को तो निरधन का निरधन रक्खेंगे, इससे कुल पाप जमीन माता के नाम का छोड़ाओ ताकि धन पीछा प्रगट हो जावे, और जिस शख्सों ने राक्षसी पाप चला-2 के धन जमे किया था उन शख्सों का धन राक्षसी पाप छोड़ाने वालों ने नहीं लिया और वहाँ का वहीं पड़ा रहने दिया, क्योंकि पाप तज जाने की वजह से कुल विलायतों में पीछा धन सतजग के जमाने का सा हो गया था, इससे राक्षसी पाप के धन को कीसी ने नहीं लिया। सो भाइयों, जबकि तुम राक्षसी पाप को संसार के लोग एक दिल होके इन बनियों के राक्षसी पाप को छोड़ाओ तो पीछा धन कुल विलायतों में हो जावेगा, कि जैसा सतजग में था और जो धन, कि रावण ने संसार का, राक्षसी पाप से लिया था उस धन को संसार ने नहीं लिया और हराम जाना, और जबकि कारुन बादशाह ने राक्षस विद्या का पाप चलाया था जब कारुन बादशाह ने भी कुल संसार का धन अपने काबू में कर लिया था; जिसका हाल तमाम दुनिया में लोग अपनी जबान से बयान करते है कि कारुन बादशाह ने राक्षस विद्या के पाप से कुल संसार का धन खेंच-2 के चालीस (40) गंज याने चालीस (40) डूंगरी धन जमे किया था, इससे उस धन को दुनिया ने नहीं लिया ओर हराम बराबर जाना, हालांकि कारुन बादशाह ने उस धन को दुनिया ने नहीं लिया और हराम बराबर जाना, हालांकि कारुन बादशाह ने उस धन को देना चाहा और ब्राह्मणों से और साधु-फकीरों से कहाँ कि तुम इस धन को ले लो, हम पुण्य दान करते हैं, परन्तु किसी ने नहीं लिया और यह जवाब दिया कि हम लोग धन को क्या करेंगे ? क्योंकि जो धन तुम हमको पुण्य दान करते हो वोह धन तुम्हारे राक्षसी पाप का जमे किया हुआ है, इससे इस दान को नहीं ले सकते; क्योंकि जो हम इस दान को ले लेवे तो हमारी औलाद भी डूब जावेगी, इस वजह से नहीं लेते। सो मेरे भाइयों, रावण वगैरा के दान को और कारुन वगैरा के दान को तो किसी ब्राह्मणों ने और साधु-फकीरों ने भी नहीं लिया और हराम के बराबर जाना; और अलावा इसके “बादशाह ने चमड़े का रुपया चलाया” जिसकी यह तारीफ तमाम जहान के लोग बयान करते हैं कि सबा रुपए की मेंख सोने की चमड़े के अन्दर लगाके ब्राह्मणों को देने लगे और कहने लगे कि इन रुपयों को तुम लो, कि जो हम तुमको दान में देते है, परन्तु तुम इन रुपयों को चमड़े के बराबर जानना और चाँदी-सोने का दान मत जानना। ऐसे-ऐसे फरेब
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