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जगतहितकाऱणी
अगरचे मेरी तरफ से इस करजे के रुपया बाबत, राज दरबार में किसी तरह का उजर करुँ तो मैं राज का गुनहगार हूँ, सो यह बनिये ऐसे-2 कागज झूठे जालसाजी के बना लेते है परन्तु राजा बादशाह जब भी इन सौदागरांन को ही सच्चा जानते हैं और गौर नहीं करते है, सो यह राक्षसी पाप का सबब है और कोई बात ऐसी नहीं कि जिससे तमाम जहान की अकल फिर जावे; सो यह सिर्फ ‘इन्द्रजाल’ की ही माया है और इस जाल से ही सबका धन काबू में कर लिया है और दूसरी विलायतों में जो धन है, उसका भी अपनी हिकमत से काबू में किया चाहते हैं क्योंकि दूसरी विलायतों में भी इनकी दुकानें पहुँच गई है और पहुँचती जाती है, सो इसी तरह से वहाँ का भी धन अपने काबू में कर लेंगे क्योंकि दुनिया में चाँदी-सोने की खानें कदीम से ही थी जिससे सोने-चाँदी का ठाट और पाट गिना जाता था। सो इन बनियों ने अपने राक्षसी पाप के जोर से कुल धन, जिसका ठाट और पाट संसार में गिना जाता था, सो इन महाजनांन ने अपने कब्जे में कर लिया है; इससे तमाम दुनिया सौदागर बनियों के पाँव नीचे है, इससे ऐ सातों-आठों विलायतों के राजा बादशाहों, यह बात काबिल गौर करने के है कि तमाम जहान खेती-बाड़ी करके राजा बादशाहों कि औलाद को खेती करने वाले ही पालते हैं और जिस पर भी हजारों तरह की वेठ बेगार को हाजिर रखते हैं और कहते है। सो इन लोगों की ऐसी-ऐसी तो करनी है और अलावा इसके यह खेती करने वाले रात-दिन जानवरों की तरह से महनत करके कमाते हैं और तमाम जहान को पालते है, सो इन लोगों की महनत को देखके तो ऐसा ख्याल करना चाहिए कि खेती करने वाले माँ-बाप के बराबर है, कि हमारी औलाद को और हमको यह खेती करने वाले ही पालते हैं, परन्तु इन सौदागरांन ने अपने राक्षसी पाप से कुल जहान की अकल ऐसी खराब कर दी है कि जो सौदागरांन के ताबेदार हो रहे है और जोकि जमीन माता के उपर कमाके देते हैं और पालते हैं इन्हों का कुछ गुण और अहसास भी नहीं जानते है। सो यह वजह इन्द्रजाल की है, क्योंकि जाल से लोगों की अकल कैद कर दी है जिससे नेक काम वोलों की पहचान नहीं होती है बलके बुरा ही बुरा सुझता है कि हर वक्त गरीबों के गले पर अकल फिरने के सबब से राजा बादशाहों ने हाथों से छुरी रखी हुई है, क्योंकि गरीब आदमी ने किसी सौदागर महाजनांन के पास से चाहे एक कोड़ी भी नहीं ली होवे और गरीब आदमी ईमान से कहे कि मैंने कोड़ी भी नहीं ली है परन्तु राज से कुछ सुनवाई नहीं होती है, और बनिये महाजन लोग झूठा जाली कागज और तमसुक इस तरह से बनाते है कि जो लाग मरे हुए है, उनके नाम से झूठी बही में और जाली तमसुक वगैरा लिख लेते हैं और उस तमसुक में गवाहीयान वगैरा भी झूठी जालसाजी वगैरा की, ऐसे लोगों की लिख लेते है कि जो लोग मर चुके है याने सात-2 पीढ़ी का करजा उनकी औलाद के साथ जालसाजी और फरेब-दगाबाजी करके लेते है, याने परदाद को दिये या नहीं दिए, झूठा रुपया ही माँगता है, तो परपोते से रुपया वसूल कर लेते है। सो ऐ तमाम जहान के लोगों, यह कोई इन्साफ नहीं हुआ, यह सारा सबब राक्षसी पाप का है जिससे राजा बादशाहों को यह खबर नहीं होती है कि गरीब ने किसी से रुपया-पैसा लिया है या नहीं लिया है या यह महाजन लोग गरीब को झूठा ही इलज़ाम देता है और अदालतों के हाकिमों को गरीब लोगों के सबूत पर बिलकुल ख्याल नहीं होता है; अगर बनिये के सामने किसी गरीब का सबूत झूठा भी होवे तो एक आदमी झूठा होवे या दो झूठे होवे, या दस झूठे होवे, यह नहीं हो सकता कि कुल बनिये ही बनिये सच्चे होवे और बाकी तमाम संसार के लोग सब झूठे हो जावें, यह तो राक्षसी पाप से बनियों ने तमाम संसार के लोगों को झूठों के मुवाफिक कर दिया है और अदालत गरीब आदमियों से यह नहीं पूछती है कि तुम्हारा सबूत या बही या रसीद वगैरा जो होवे तो अदालत में पेश करो, यह तो गरीब से कोई नहीं पूछता और बनिया चाहे झूठा होवे और चाहे सच्चा होवे, उसको ही हर सूरत से सच्चा समझते हैं; परन्तु यह सारा ही सबब राक्षसी पाप का है कि अदालत के हाकिमों की अकल और सब संसार की अकल इन बनिये महाजनांन ने अपने बस में कर रखी है,
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