Home About Us Gallery Artical English Contact Us
    Book  
     परमात्माने नमः
     इन्द्रजाल
     रोग-बीमारी
     राक्षसी पाप
     जमीनमाता
     इन्द्रजाल पाप
     चौरासी लाख
     पाप चलाया ह
     गौत्तम ऋषिजी
     सौदागर महाजनांन
     राक्षसी विद्या
     सो वेद-पुराणों
     रकाषसी पाप
     कुण्डियों
     कारुन बादशाह
     हिन्दू-मुसलमानों
     अंग्रेजों
     डॉक्टरों की रोटी
     स्वर्ग-नर्क
     बुद्धि भ्रष्ट
    Artical  
     What is Earth
     जीव हत्या
     राक्षसी मायाजाल
   
   
   
   
   
   
 
जगतहितकाऱणी
वक्त गौत्तम ऋषिजी गंगा पर अशनान के वास्ते जाते थे और गौत्तम ऋषि की औरत अहलीया बहुत खूबसूरत थी, सो इन्द्रमहाराज अहलीया के साथ हराम करने का ख्याल रखते थे; जब एक रोज गौतम ऋषिजी मुरगे की आवाज सुनकर गंगा पर अशनान के वास्ते गये, परन्तु उस दिन इन्द्र महाराज ने मुरगे को यह कह दिया था कि आद तुं आधी रात को बोलना, तो जब मुर्गा आधी रात को बोला तो गौत्तम ऋषिजी गंगा पर अशनान के वास्ते चले गये और उनके जाने के बाद इन्द्र महाराज उनकी औरत अहलीया से हराम करने को आए और चनद्रमा को पहरे पर खड़ा किया था; जब गौतम ऋषिजी गंगा पर पहुँचे तो गंगा ने गौतम ऋषिजी से यह कहा कि तुम इसी वक्त अपने घर को वापिस चले जाओ, क्योंकि तुम्हारे घर में कोई छल है। जब गंगा के कहने से उसी वक्त गौतम ऋषि बगैर अशनान किये अपने घर को चले आये और आकर देखा तो घर में छल ही था, और इन्द् महाराज मौजूद है और चन्द्रमा पहरे पर खड़ा है, जब कहते है कि गौतम ऋषि ने बहोत गुस्सा किया और चंद्रमा को श्राप दिया और अपनी धोती के फटकारे से छाँटे दिये कि उन छाँटो से चंद्रमा में काले दाग पड़ गये और अपनी औरत अहलीया को यह श्राप दिया कि तूं पत्थर की होकर गंगा पर जा पड़ना। सो संसार में कहते है कि वोह औरत श्राप देते ही पत्थर की होके गंगा के तीर पर जा पड़ी, बहुत दिनों तक वहीं पड़ी रही और चिस वक्त रामचन्द्रजी महाराज जनक राजा के यहाँ जग में आए तो उन्होंने उसी पत्थर के उपर जो पत्थर कि अहलीया हो गई थी, अपनी जोड़ी जूते की झाड़ी तो वोह फिर अपनी असली सूरत पर औरत बन गई। भला गौर करने की जगह है कि आदमी पत्थर क्यों कर हो सकता है और फिर पत्थर से आदमी कैसे हो सकता है? तुम संसार के लोग इस बात को दिल से ख्याल करो कि इस झूठ का कहाँ ठिकाना है? मैं कहाँ तक इस झूठ का हाल लिखूं? झुठ तो दुनिया में बहोत है और लिखने वाला में एक कहाँ तक लिख सकता हूँ, मैं तो कोई-2 बात तुम संसार के लोगों को, आँखें तुम्हारी खोलने के वास्ते लिखता हूँ सो तुम सब संसार के लोग इन्साफ की आँखों से देखो कि जो मैं लिखता हूँ, यह सच मालूम होता है; या यह अगली बातें जैसे गौतम ऋषिजी की और इन्द्र महाराज की है यह सच्च मालूम होती है। अब जरा इस बात को सुनो तो सही कि गौतम ऋषि ने इन्द्र महाराज को आप दिया सो वोह कोढ़ी हो गये और उनके बदन में सुराख और बंग हो गये, और कहते है कि गौतम ऋषिने चन्द्रमा में काले दाग पड़ गये, और रामचंद्रजी के जुते झाड़ने से पत्थर से फिर औरत हो गई, और गंगाजी गौतम ऋषि को मुँह से बोली कि तुम अपने घर वापिस चले जाओ। तो गौर करो कि आदमी को मालिक ने अकल समझने के वास्ते दी है सो तुम सब संसार के लोग अपनी अकल से समझो कि गंगा जो है वोह तो जल है, जल मुँह से कब वोल सकता है? और चन्द्रमा जो है ज्योति स्वरूप है वोह ऐसे खोटे कामों के उपर पहरा क्यों देते? और गंगा का मान और बुर्जगी इस वास्ते है कि वहाँ पर साधु, फकीर और अच्छे लोग तपे है जिससे इस नदी का नाम प्रगट है, नहीं तो जैसे और नदी है वैसे गंगा भी एक नदी है, और जो कोई यह ख्याल करे कि गंगा का पानी नहीं बिगड़ता हैं और कीड़ें वगैरा नहीं पड़ते हैं और दूसरी नदियों का पानी खराब हो जाता है और कीड़े वगैरा पड़ जाते हैं; इससे गंगा में यह बात ज्यादा है, सो भाई मेरे हो इसका सबब यह है कि इन महाजनांन ने गंगा के नामका पाप करके अभी तक रोग नहीं किया है जिससे यह पानी नहीं बिगड़ता है और दूसरी तमाम नदियों के नाम का पाप करके रोग कर दिये हैं जिससे उन नदियों के पानी में कीड़ें पड़ जाते हैं और पानी खराब हो जाता है, सो जिस दिन गंगा के नामका पाप करके गंगा को रोग कराया उस दिन इसका पानी भी खराब हो जावेगा, इसी तरह से यह बात पेशतर से ही प्रगट कर दी है कि गंगाजी अलोप हो जावेगी और इसका महातम कम पड़ जावेगा। सो भाई मेरे हो, अलोप हो जाना और महातम और मान कम हो जाना गंगा का यह ही है कि यह बनिये महाजन लोग गंगा के ना का पाप कराना शुरु करके इसको रोग करा देंगे तो उस पाप के होने से गंगा के पानी में यह बात जो अब है, नहीं रहेगी; और इसके पानी में कीड़े वगैरा पड़ने को लग जावेंगे तो फिर संसार के लोगों के दिल में गंगा का मान और महातम
  Previous   First 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33...45....60....70....   next  
Home About Us Artical Gallery Contact Us Download Hindi Font
Copyiright @ 2007 Jagathitkarni.org. All rights reserveed