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जगतहितकाऱणी
बीमार के नाम का पाप कराना उन चौरासी लाख कुण्डियों पर से छोड़ देते है तो फिर वोह बीमार अच्छा हो जाता है; इससे देवतों के परचों को सच्चा जानते हैं। मगर उनको यह खबर नहीं है कि रावण की तरह से इन बनियों ने भी राक्षस विद्या का पाप चलाया है, अगरचे इन बनियों के राक्षसी पाप की खबर दुनिया को पड़ जाती तो दुनिया फौरन इनके जाल को छोड़ा देती परन्तु संसार को अब तक इनके जाल की खबर नहीं है इससे दुनिया के लोग अपने हाथों से करोड़ो जानवरों को देवतों के उपर मारते हैं, और अलावा इसके संसार के अन्दर हैजा की बीमारी में करोड़ो शख्सों को मार देते हैं और राजा बादशाहों के हाथों से करोड़ो जानवरों को मरवा देते है जब करोड़ों पाडा बकरों के चमड़ो की चीरें करवा-2 के दरखतों की मुलायम डालियों में बाँघ-2 के लटका देते हैं, और जो संसार उनको चमड़ो की चीरे ना करे तो बेचारे संसार को जादू से बीमार करके ऐसा सुझा देता हैं कि तुम खालों को चीरकर झाड़ो और दरखतों के उपर खाल की चीरे बाँघो, जब बाँघते है और नहीं बाँघे तो उनको यह सुझाते हैं कि देवता ने बकरा-पाड़ा नहीं माना इससे उसको जादू से बीमार ही रखते है, सो जबकि वोह चमड़े की चीरें सुख जाती है जब दरखतों को तकलीफ होती है क्योंकि जिस तरह से अपने शरीर में जान है इसी तरह से इन दरखतों के अन्दर भी जान है जिससे दरखत ‘सरसबज’ रहते हैं सो “यह दरखत तो ऐसे सती है कि अपने को फल-फूल खिलाते हैं और आप धूप में खड़े रहते है और दूसरे पर छाया करते है और उनकी लकड़ियों को अपन लोग जलाने के काम में लाते है,” और जो कि वनास्पति है वोह तमाम जहान के लिए रिजक है क्योंकि तमाम इससे परवरश पाते है सो सबको ही मालूम होता है, और मैं जो आप लोगों को बार-बार लिख करके दर्शाता हूँ सो सिर्फ इस गरज से दर्शाता हूँ कि तुम संसार के लोगों की बुद्धि इन बनियों के राक्षसी पाप से भ्रष्ट हो रही है इससे दूसरे जीवों की पहचान तो क्या तुमको अपने शरीर की ही पहचान नहीं रही है, क्योंकि इन बनियों ने अपने राक्षसी पाप से वनास्पति-सी चीजों को ही भूत-पलीत बना रखा है और दुनिया के हाथों से उन दरखतों के अन्दर कीलों तक गड़वा देते है। सो यह दुनिया की भूल है क्योंकि दरखतों के अन्दर ना तो भूत है और ना पलीत-खवीस वगैरा है, यह तो सिर्फ सौदागर महाजनांन की जालसाजी है क्योंकि अपन लोगों की बुद्धि भ्रष्ट करदी है इससे ऐसा ही सूझता है, बलके यहाँ तक तो इनका जाल है कि नींद के अन्दर सुपना वगैरा होता है जैसे कि नींद में मरे हुए का सुपना सुझ जाता है, उसी तरह जादू से मरे हुए का जागता सुपना किसी-2 को कर देते है और फिर उसी के घट में ऐसा सुझा देते है कि मेरे को भूत मिला है और देखा है और जिसको सुपना कराते हैं फिर उसको जादू से बीमार कर देते है और बीमार करके उसको यह सुझा देते है कि मेरे को फलाने दरखत के नीचे या और किसी जगह भूत लग गया है जिससे मैं बीमार हो गया हूँ, और साधु फकीर संसार में से भी किसी को ऐसा ही सुझा देते हैं कि इसको भूत लग गया है सो मैं इस भूत को झाड़ा देकर निकाल सकता हूँ, और वोह झाड़ा देने वाला बकरा वगैरा मँगावे और यह कहे कि भूत-खबीस बकरा माँगता है, नहीं तो भूत ऐसा जबरदस्त है कि इस बीमार का जीव ले जावेगा; इस बीमार के उपर बकरा फेर के मारो सो इस बकरे का जीव तो भूत ले जावेगा और यह बीमार बच जावेगा, तो फिर उस बकरे को मार देते है और वोह झाड़ा देने वाला कहता है कि मैं भूत को झाड़ में कील दूँगा तो भूत फिर इसको नहीं लगेगा। जब उस झाड़ा देने वाले को जादू से ऐसा सुझा देते है कि वोह यह कहता है कि मैंने भूत को पकड़ लिया है और झाड़ में कीलूंगा और जिन-2 रजवाड़ों में यह भूत-पलीत का पाप चलाया है वहाँ हजारों दरखतों में लोहे की कीलें गड़वा देते है और ना कोई भूत है और ना पलीत-खबीस, डाकन वगैरा है, फक्त यह तो बनियों का राक्षसी पाप है और दरखतों में जो कीले गड़वाते हैं सो यह दरखत तो बेचारे बड़े सती है मगर कीले गाड़-2 कर नाहक तकलीफें देते है और बकरे वगैरा जो देवतों और भूतों का बहाना करके हजारों जीवड़ों को मारते है तो नाहक बेचारों को संसार के हाथों से जीव मरा करके तकलीफें देते है और जादू से संसार को बीमार कर-2 के भूतों का और देवतों को सुझा-सुझा के करोड़ों जीवड़ों को देवतों और भूतों और पलीतों के नाम से मरा देते है।
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