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जगतहितकाऱणी
क्योंकि यह जादूखोरा जमीन के नाम का पाप कराके जमीन में आग भी लगा देते हैं जिससे करोड़ों जीव जल जाते है जिससे बुरा भी जल्दी होता है और यह जादू खोरा लोग संसार के लोगों को बहका करके ऐसा सुझाते है कि तुम उल्लू जानवर को मार के और उसकी दवा बनाकर जिसकी आँख में डालोगे या दूसरे की औरत के कपड़े में लगा दोगे तो वोह तुम्हारे कहने में हो जावेकी, सो भाई मेरे हो, जादू कोई चीज नहीं है यह तो राक्षसी विद्या का पाप चलाया हुआ है जिसका कुछ अन्दाज नहीं हो सकता है। अगरचे दुनिया इस पाप का हिसाब करे तो इसकी गिनती भी नहीं हो सकती है क्योंकि राक्षसी पाप बहुत हो रहा है सो इस बात को जरुर ही समझना चाहिए कि इन बनियों ने किस तरह से पाप चलाये है, कि जो कोई भी साहब ख्याल नहीं करते कि इन बनियों ने राक्षसी पाप से सबकी अकल खराब करदी है जिससे दया धरम ही नहीं जानते हैं बलके संसार के ही हाथों से बहुत पाप करा रहे हैं, और जो कि देवता हुए हैं सो उन्होंने मालिक की भक्ती की है। इससे उनकी समाधि का पूजना तो दुरस्त है परन्तु समाधि को तो नहीं पूजते हैं और उनकी समाधियों के उपर उनके नाम से अपने हाथों से जानवरों को मारते हैं। सो धरम की पूजन तो नहीं करते हैं और जीवड़ों को मारने लगते हैं, सो संसार को तो कुछ दोष नहीं है क्योंकि उनकी बुद्धि तो जादू से कैद है इससे दया धरम भूल गये हैं; सो जिन-2 रजवाड़ों में देवतों के उपर जीव मराने शुरु किये है और जब संसार में भूल पड़ जावेगी जब तो सब दुनिया को जादू से बीमार करके व देवतों का सुझा-2 के जितने संसार में हिन्दु-मुसलमान और अंग्रेज वगैरा के कुल में भक्त लोग हुए हैं, सो देवता सरुपी लोग भक्त ही होते है। चुनाचे सबकी समाधियों पर जीव मराना शरु करा देंगे। इसी तरह से जैसे कि अब जिन-2 रजवाड़ों में देवतों पर जीव मराते हैं और संसार को जादू से खबर भी नहीं पड़ने देंगे, सो यह बनिये पहले तो अपने राक्षसी पाप से संसार के लोगों को बीमार कर देते हैं और फिर ऐसा सुझा देते हैं कि देवतों ने बीमार किया है, सो देवता जानवर को चाहता है सो देवता के नाम का देवता के उपर बकरा चढ़ाओं जब तुमको आराम होगा, सो वोह बीमार आदमी अपनी बीमारी के सबब से और डर की वजह से अपनी जिन्दगी के खातिर चढ़ा देते है, सो वो तो बनियों के राक्षसी पाप से भूले हुए हैं जिससे जैसा कि सुझाते हैं वैसा ही करने को लग जाते हैं। सो बीमार आदमी के नाम का पाप करना छोड़ देते हैं जब वोह अच्छा हो जाता है सो इन लोगों की बुद्धि इन बनियों ने अपने राक्षसी पाप से ऐसी खराब कर दी है जिससे ऐसा ही सुझता है कि जो भक्त होता है उसको भी ऐसा ही राक्षसी पाप से करते हैं कि जिससे उनको भी खबर नहीं होने देते है कि पाप का कराना बुरा है या भला है। सो ऐ संसार के लोगों, पाप का कराना तो बुरा ही है सो किसी जानवर को या दूसरी जीवाजून को मत सताओ बलके दूसरे शख्स को मारते हुए देखो तो मत मारने दो। जिस तरह से कि जानवरों की और दूसरी जीवाजून की जान है उसी तरह से सबके शरीर में भी जान है, सो जीवाजून की जान तुम्हारी कोशिश करने से बच सके तो बचाओ, क्योंकि नेकी का दरजा है वोह अच्छा ही है, मगर यह बनिये अपने राक्षसी पाप से साधु फकीरों को भी ऐसा ही सुझा देते है कि समाधि के उपर बकरा चढ़ाना दुरस्त बात है, अगरचे वोह दया भी करे तो राक्षसी पाप के जादू से उसको दया भी नहीं करने देते है तो उसको दया भी नहीं आवे और वैसा ही कहने को लग जावे, और जब यह बनिये राक्षसी पाप से साधु फकीर को बीमार कर देते है और उनके घट में देवतों का छल सुझा देते है तो वोह भी जानवरों को अपने हाथ से मारने को लग जाते है और जब अच्छे हो जाते है तो फरि परचों के भरोसे से यह कहने लग जाते है कि देवी-देवता सच्चा है और में झूठा हूँ, और यह नहीं समझते है कि यह रावण के मुवाफिक राक्षसी पाप का करतब है और यह महाजन लोग पहले तो उसके नाम का पाप चौरासी लाख कुण्डियों पर कराके उसको बीमार कर देते है और उसके घर वालों को या खुद उस बीमार को जादू से ऐसा सुझा देते है कि देवता ने बीमार कर दिया है सो देवता जीव माँगता है, जादू से ऐसी बुद्धि फेर देते है और जब यह समझते हैं कि अब तो बीमार के घर जीव याने बकरा-पाड़ा वगैरा देवता के नाम से मार दियाच गया है, जब उस बीमार के नाम का पाप कराना उन चौरासी लाख कुण्डियों पर से छोड़ देते है
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