Home About Us Gallery Artical English Contact Us
    Book  
     परमात्माने नमः
     इन्द्रजाल
     रोग-बीमारी
     राक्षसी पाप
     जमीनमाता
     इन्द्रजाल पाप
     चौरासी लाख
     पाप चलाया ह
     गौत्तम ऋषिजी
     सौदागर महाजनांन
     राक्षसी विद्या
     सो वेद-पुराणों
     रकाषसी पाप
     कुण्डियों
     कारुन बादशाह
     हिन्दू-मुसलमानों
     अंग्रेजों
     डॉक्टरों की रोटी
     स्वर्ग-नर्क
     बुद्धि भ्रष्ट
    Artical  
     What is Earth
     जीव हत्या
     राक्षसी मायाजाल
   
   
   
   
   
   
 
जगतहितकाऱणी

सो ऐसे-2 जाल राक्षस विद्या के चलाने वाले अगले सती लोगों को भी मालूम नहीं होने देते थे, सो इसका सबूत वेद और पुराणों में लिखा है कि अगले जमाने के लोग ऐसे भक्त थे कि परमेश्वर का ही भजन करते थे और बुरे कामों से बचते थे, याने उनके पास होकर के नहीं निकलते थे और अपनी चीज को अपनी जानते थे और पराई चीज को पराई जानते थे और दया-धरम में ही रहते थे। सो ऐसे-2 सती लोगों को जमीन के शरीर की पहचान भुला दी थी, सो इस जमाने में इन सौदागर महाजनांन ने अपने इन्द्रजाल के पाप से सबकी अकल को खराब कर धी है जिससे भाई-2 में एका नहीं हैं बलके ना इत्तफाकी का हौसला बढ़ गया है, सो यह सौदागरांन का जाल है सो जिस तरह से कि दुनिया रावण के राक्षसी पाप को स्वर्ग जानती थी उसी तरह से अब बनियों के राक्षसी पाप को दुनिया स्वर्ग जानती है, कि जो बनियोंने रावण की तरह से चौरासी लाख कुण्डियाँ राध लहु की किसी समुद्र के दरमयान में पाप करके संसार को गारत करने के लिए बनाई है। सो जिस तरह से कि तमाम दुनिया रावण के जाल की माला फेरती थी उसी तरह पर अब इन बनियों के स्वर्ग की माला तमाम दुनिया फेर रही है, सो जिस तरह से कि रावण का राक्षसी जाल था उसी तरह पर इन सौदागरांन का राक्षसी जाल है मगर रावण के जमाने में तो रावण के राक्षसी पाप को शनिचरजी महाराज ने सारे जहान में प्रगट किया था, और वोह जात के तेली थे जिसको गरीब शख्स देखकर राक्षस विद्या के पाप मैं कैद कर दिया था, और रावण अपने पापकी खबर नहीं पड़ने देता था मगर जबकि रावण के गुप्ती पाप की खबर पड़ी जब शनिचरजी महाराजने तमाम राजा बादशाहों को और रैयत वगैरा को वाकिफ किया तो उन लोगों ने एक दिल होकर रावण के राक्षसी पाप को छोड़ाया, लेकिन अगले जमाने के लोग ऐसे नेक व सती थे कि उन्होंने उस बात को फौरन कबूल कर लिया औऱ दिल में विचार करके यह कहने लगे कि अगर हम संसार के लोगों ने एक दिल हो करके इस राक्षसी पाप को ना ताजाया तो रावण कुल जहान को जरुर गारत कर देगा; जब कुल जहान ने इस बात का ख्याल करके और शनिचरजी के कहने को कबूल करके रावण के राक्षसी पाप को मिटा दिया और शनिचर की मनशाये दिली को अपने सर व आँखों पे रक्खा और यह बात अरज किया, कि हम लोगों को रावण ने अपने राक्षसी पाप से अन्धों की तरह से कर दिया था कि जो जमीन के शरीर की पहचान तक भुला दी थी, परन्तु रावण ने शनिचर को अपने राक्षसी पाप से दुखी किया था, जब रावण के राक्षसी पाप की खबर पड़ी। अगरचे रावण ने अपने राक्षसी पाप से शनिचर को नहीं कलपाया होता तो हरगिज रावण का राक्षसी पाप मालूम नहीं होता, मगर शनिचर को कलपाया जब रावण की चोरी संसार में प्रगट हुई। जब तो प्रगट होते ही संसार ने रावण के राक्षसी पाप को छोड़ाया, गरज कि रावण की तरह से इन सौदागर महाजनांन का भी राक्षसी पाप हो रहा है जिससे तमाम जहान के लोगों की अकल फिरी हुई है कि अपनी चाज को अपनी और पराई चीज को पराई नहीं जानते हैं, परन्तु इन सौदागरांन ने रावण की तरह से मुझ गरीब (अनोपदास) को अपने राक्षसी पाप से कलपाया है इससे इन सौदागरांन का राक्षसी पाप मालूम हुआ है, क्योकि यह महाजन रावण की तरह से राक्षसी पाप कर रहे हैं; और जिस तरह से शनिचर जात का तेली था उसी तरह से मैं जात का चाकर हूँ, सो मुझ गरीब को इन सौदागर महाजनांन ने अपने राक्षसी पाप से कलपाया है और अमीर लोगों को तो मारे डरके समामुख नहीं कलपाते हैं लेकिन यह बनिये अपने राक्षसी पाप से गारत तो सबको कर रहे हैं, परन्तु अपने राक्षसी पाप से दुखी तो बगैर  जबान वालों को और गरीब आदमियों को ही करते हैं, इसलिए मैं गरीब साधु तमाम जहान के लोगों को इन बनियों के राक्षसी पाप से वाकिफ करता हूँ कि इन बनियों के अनेक तरह के छल है और फरेब है कि जैसे रावण के अनेक तरह के छल और फरेब थे, उसी तरह से इन सौदागरांन के भी है। सो जिस तरह से कि रावण के वक्त में शनिचर के कहने से तमाम जहान ने एक दिल होकर रावण के राक्षसी पाप को छोड़ाया था, उसी तरह अब इन सौदागरांन के राक्षसी पाप को भी तमाम जहान के लोग एक दिल होकर मुझ साधु के कहने से छोड़ाओ ते इन बनियों के जाल से सबको सुख प्राप्त होवे, क्योंकि इन सौदागरांन के जाल से तमाम जहान के चौपाये व पंखेरु और मय आदमियों के तकलीफ पाते है,

  Previous   First 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26...40....55....70....   next  
Home About Us Artical Gallery Contact Us Download Hindi Font
Copyiright @ 2007 Jagathitkarni.org. All rights reserveed