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जगतहितकाऱणी

अभी तो रावण ने अपने राक्षसी पाप से थोड़ी-2 अकल खराब करी है और जो ज्यादा पाप कराया तो कुल सृष्टि की औलाद को गारत करा देगा, इससे रावण के राक्षसी पाप छोड़ाने का अभी से बंदोबस्त करना वाजिब है ताकी जोर ना पकड़ने पावे, और जो जोर पकड़ गया दो फिर पाप का छुटना मुश्किल है; जब तमाम जहान ने एक दिल होकर रावण के राक्षसी पाप को छोड़ाया जब जहान की औलाद को सुख प्राप्त हुआ। अलावा इसके “दुनिया यह कहती है कि सूरज-चंद्रमा रावण के रसोड़े को तपता था,” यह बात खिलाफ है क्योंकि दुनिया की अकल ऐसी खराब कर दी है कि झूठी बात जो कोई जमीन के पडदे पर कहता है उसको यकीन से सच्चा मान लेते हैं, जिसकी वजह यह है कि सब संसार के लोगों की अकल राक्षसी पाप से भ्रष्ट कर दी है जिससे जूठी बात को बी सच्चा मान लेते हैं। देखो भाई कि सूरज-चन्द्रमा कौनसा आदमी थे कि जो रावण के रसोड़ं को तपते थे? सो यह बात तो इस तरह से है कि जिस तरह से अपनी देह के अन्दर रोशनी होती है, उसी तरह से जमीन माता के देह में भी सूरज-चन्द्रमा कुव्वत के सबब से रोशनी रखते है, सो यह बात इस तरह से है कि जमीन के पेटमें अगनी का रोग जादू से कर देवे तो पहाड़ या और कोई जगह आप ही जलने को लग जावे, सो वोह जगह  अगनी के रोग की वजह से ऐसी तपती है कि जो चाहो तो खाना वगैरा उस जगह पका लो, और यह अगनी का रोग ऐसा है कि जैसे आदमी के पेट में या बदन में गरमी की आग उठ जावे, इसी तरह से जमीन को भी गरमी वगैरा का रोग कर देते है और अपना जाल प्रगट ना होने के लिए ऐसी-2 बातें प्रगट कर देते है कि सूरज रावण का रसोड़ा तपता था, और असल में जमीन माता को यह रोग अग्नि का कर देते हैं और दुनिया की बुद्धि भ्रष्ट कर देते हैं जिससे जमीन माता के रोगों को समझते ही नहीं। जादू से जमीन माता को फाड़ भी देवें जब भी नहीं समझे और यह नहीं जानते कि जमीन माता का भी हमारे मुवाफिक जिन्दा शरीर है, जो यह फटती है तो इसको भी बहोत दरद होता है और ‘बाजईत्तफाक’ ना दुरुस्त होने, तबियत गर्मी वगैरा के सबब से ऐसी कुमला जाती है कि जो खाना-पीना भी नहीं खाया जाता है, बलके पेटमें बीमारी के सबब से हजारों तरह के कीड़ें पैदा हो जाते हैं तो फिर कैसी तबियत हैरान रहती है; तो इसी तरह से जमीन माता के नामका पाप चौरासी लाख कुण्डयों के उपर सरद-गरम का रोग करावे तो मकान व किला वगैरा की दीवारें जलने को लग जावे। सो इन बातों को दुनिया तो जादू चाले के पाप से भूली हुई है क्योंकि यह बनिये लोग अपने राक्षसी पाप से इस बात को जाहिर नहीं होने देते हैं, परन्तु यह बात इस तरह से है कि जब जमीन के नामका पाप कराते है जब अग्नि आप से आप लग जाती है और ऐसा भी होता है कि यह जो बनिये जादू के जोर से सूरज-चंद्रमा को नीचे उतारना चाहें तो उतार भी सकते हैं और अगले लोगों ने राक्षस विद्या वालों को अच्छी तरह से हाथ दिखाये हैं कि उनकी औलाद को गारत कर दिया था, इस सबब से यह बनिये डरते हैं कि जो हमारा जाल लोगों को मालूम हो गया तो हमको भी मय औलाद के संसार के लोग मार डालेंगे, जिससे डरते हुए सूरज-चंद्रमा को नीचे नहीं उतारते हैं; क्योंकि अगले लोगों को जिन-2 ने जाल चलाया था उनको अच्छी तरह से सजा मिल चुकी है, और अलबत्ता लोगों को भूल डाल के और कोई देवता फकीरों की करामात का नाम लगाकर तो कभी उतारेंगे और अपना जाल प्रगट ना होने के वास्ते पहले से करामात वगैरा का नाम मशहूर कर देते हैं, जैसे कि ‘शम्सतबरज’ फकीर का हाल लोग बयान करते हैं कि जब उसके बदन की खाल उसने अपने हाथ से उतार दी थी तो अन्दर से कोरा मांस उसके बदन का निकल आया, तो उसको संसार में कोई अपने पास नहीं आने देता था, जब वोह कसाई से मांस लाया और वोह टुकड़ा मांस का सेकने के वास्ते सूरज को नीचे उतार लिया और वोह मांस सूरज की गरमी से सेककर खाया तो तमाम दुनिया जलने लगी; सो यह बात बिलकुल गलत है क्योंकि जो वोह फकीर गोस्त का टुकड़ा सूरज की गरमी से सेकता तो उसके बदन की खाल उतरी हुई थी और वदन का कोरा मांस निकला हुआ था, तो वोह फकीर सूरज की अग्नि से आप भी जल भुन जाता, तो वोह आप किस तरह से बच गया और ऐसा मालिक भी नहीं है कि जो एक आदमी के वास्ते सब दुनिया को जला देवे,

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