Home About Us Gallery Artical English Contact Us
    Book  
     परमात्माने नमः
     इन्द्रजाल
     रोग-बीमारी
     राक्षसी पाप
     जमीनमाता
     इन्द्रजाल पाप
     चौरासी लाख
     पाप चलाया ह
     गौत्तम ऋषिजी
     सौदागर महाजनांन
     राक्षसी विद्या
     सो वेद-पुराणों
     रकाषसी पाप
     कुण्डियों
     कारुन बादशाह
     हिन्दू-मुसलमानों
     अंग्रेजों
     डॉक्टरों की रोटी
     स्वर्ग-नर्क
     बुद्धि भ्रष्ट
    Artical  
     What is Earth
     जीव हत्या
     राक्षसी मायाजाल
   
   
   
   
   
   
 
जगतहितकाऱणी

इससे जमीन को पाप लग गया था; सो ग्रहण का पड़ना दुनिया में रावण ने चलाया था सो यह बात दुरस्त है, सो रावण के वक्त में तो रावण ने दो चार बार ही ग्रहण पड़ाया था। रावण ने सूरज-चन्द्रमा को दो चार बार ही बाँधकर ग्रहण डाला था जिससे दुनिया में यह बात प्रगट है कि रावण ऐसा था कि सूरज-चन्द्रमा को व पवन और पानी को भी बाँध लेता था ऐसा काम उसने किया था, जिससे उसकी यह बात मशहूर चली आती है परन्तु यह बनिये बेईमान बारह महीने में दो तीन दफे ग्रहण पड़ा देते है, सो तुम सब संसार टीपणों में सुनते ही हो सो यह बात दुरस्त है कि जो जमीन के नामका पाप किया जाता है वोह जमीन को लग जाता है, जब उन्होंने अपने दिल में यह ख्याल किया और परमेश्वर से डरा की जमीनमाता के आसरे  तो कुळ सृष्टि और जहान बसता है और हम भी जमीन के आसरे से ही पलते है, इससे जमीन के नामका पाप नहीं कराना चाहिए, क्योंकि जमीन माता तो सब चीजों की पालने वाली है कि जो चीज जमीन के उपर होती है और है, और जमीन के उपर राजा बादशाह और तमाम जहान और चौपाये पंखेरु वगैरा रहते हैं, अगरचे उन्हों को हमारे इस राक्षसी पाप की खबर पड़ गई तो मुझको भय औलाद के गारत करा देंगे। इस बात को भविक्षण ने अपने दिल में सोचा और सोच विचार कर अपने बड़े भाई रावण से कहा कि जमीन माता के नामका पाप नहीं कराना चाहिए, क्योंकि जमीन माता के उपर कुल जहान के लोग बसते है; अगर तुम्हारे राक्षसी पापकी खबर दुनिया को पड़ गई कि रावण जमीन के नामका पाप कराता है तो तमाम जहांन बगेर एक दिल हुए के अपनी औलाद को ही गारत कर देंगे, सो इस बात का जिकर भविक्षण ने अपने भाई रावण से करके कहा कि तुम पाप करना छोड़ दो, परन्तु रावण ने अपने भाई भविक्षण का कहा न माना और राक्षसी पाप कराता रहा लेकिन भविक्षण अपनी भक्ती की वजह से संसार के लोगों से बहोत डरा, और डर की वजह से अपने भाई रावण को छोड़कर एक तरफ को बचा, सो अपने भाई रावण के राक्षसी पाप से बच कर अपने कुल का नाम सलामत रखा। सो यह बात वेद और पुराणों में लिखी है कि भविक्षण अपनी भक्ती से भक्त था और रावण व भविक्षण जो आपस में मिल के जमीनमाता के नामका पाप कराते तो संसार के लोगों को जो खबर पड़ती कि भविक्षण भी रावण के साथ पाप करा रहा है, परन्तु भविक्षण तो पाप करने से बचा हुआ था इससे बच गया। आगर रावण के शामिल होता तो भविक्षण की भी जान औलाद समेत निकाल डालते लेकिन भविक्षण संसार का और अपनी भक्ती का डर करके अलाहदा रहा और नेकी की वजह से अपना नाम सलामत रक्खा, परन्तु रावण जमीन माता के नामका पाप कराता था इससे जमीन माता दुबली हो गई थी फिर उसके शरीर में चरबी कहाँ से रहती, लेकिन जमीन के शरीर में चरबी इन चीजों को कहते हैं कि जिनको फी जमाने में चाँदी व सोने की खानें बोलते हैं वोह चरबी है परन्तु रावण के वक्त में तो चाँदी-सोने की खाने मौजूद थी, क्योंकि रावण जमीनमाता के नामका पाप थोड़ा कराता था इससे जमीन माता रावण के जमाने में दुबली नहीं हुई थी लेकिन रावण दुनिया के नामका पाप अलबत्ता कराता था, सो खास बजह रावण के जाल चलाने की यह थी कि जब संसार के लोग थोड़े-से रहेंगे और अकल खराब हो जावेकी तो हम अपना राज चार कूंट और चौदा मांण में अच्छी तरह से करेंगे; इससे काफ जाहिर होता है कि दुनिया के नामका पाप रावण कराता था, परन्तु जिस वक्त की रावण के राक्षस विद्या की खबर दुनिया को हुई कि रावण तमाम दुनिया को अपने राक्षसी पाप से गारत किया चाहता है जब तमाम दुनिया ने एक दिल होकर रावण के राक्षसी पाप को मिटा दिया, बलके रावण पाप ना छोड़ने की वजह से ईमान हार हुआ, जब खुद अपनी औलाद को तमाम जहान के हाथों से अपने साथ ही मरा दी। सो भाई मेरे, यह बात काबिल गोर करने के है कि राज तेज तो धरम और नेकी का है परन्तु नेकी का छोड़ना अच्छा नहीं, क्योंकि रावण ने दुनिया का अकल अपने राक्षसी पाप से थोड़ी खराब की थी सो कुल जहान के राजा बादशाह व रैयत वगैरा ने और साधु फकिरों ने एका करके फौरन रावण के राक्षस विद्या को छोड़ा दी। सो जल्दी पाप छुटने की वजह यह थी कि सृष्टि ने अपनी औलाद की तरफ देखा कि अभी तो रावण ने अपने राक्षसी पाप से थोड़ी-2 अकल खराब करी है

  Previous   1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17.... 30.....50....60....   next  
Home About Us Artical Gallery Contact Us Download Hindi Font
Copyiright @ 2007 Jagathitkarni.org. All rights reserveed