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जगतहितकाऱणी

महाजन जमीन के नाम का होम याने पाप कराते हैं और रोग व बिमारी पैदा कर देते हैं तो जमीन माता भी बीमार हो जाती है, इससे कहीं बरसता है और कहीं नहीं बरसता है; क्योंकि जिस तरह से आदमी जिन्दा दिल है उसी तरह से जमीन माता भी जिन्दा है, और टीपणों में यह लिखते हैं कि अब के बरस पवन जियादा चलेगा तो जमीन माता को जादू से दम का रोग कर देते हैं तो इन महाजनांन की इससे यह गरज है कि धान रीजक वगैरा कम होवे तो इनके घर में फायदा पड़ता है, तो पवन का रोग इस तरह से है कि जैसे आदमी को दम का रोग हो जाता है और जो टीपनों में यह लिख देते है कि अबके बरस अग्नि चाला बहोत होगा तो उस बरस जमीन के नाम का पाप कराके गरमी का रोग कर देते हैं, जैसे आदमी के पेट में गरमी और आग पैदा हो जाती है और कहीं-2 गरमी का जादू से ज्यादा रोग करते हैं तो बहोत से गाँव जल जाते हैं और जंगल व पहाड़ों में धान, घास, झाड़, वनास्पति वगैरा खुद-ब-खुद जल जाते है और मैं कहाँ तक लिखूं आप लोग गौर करो तो बहोत से होग इन महाजनांन ने जमीन माता को जादू से कर रखे है कि जिससे पैदावार धान वगैरा की नहीं होती है और इन्होंने बेशुमार रोग जमीन माता को कर दिए है जिससे धान वगैरा नहीं होता है और मैंने तो एक-दो बात आप लोगों के वाकिफ करने को लिखी है और जैसा कि सतजग में रीजक होता था वैसा अब नहीं होता है, क्योंकि जमीन माता के शरीर में बारो मास ही जादू से रोग रखते है इससे सतजग के मुवाफिक रीजक नहीं होता है जिससे कुल दुनिया दुखी है और जो टीपणों में यह लिखते हैं कि अबके बरस आदमियों में बीमारी कम है तो उस बरस संसार के नामका पाप थोड़ा काम करते है और जो, टीपणों में यह लिखते हैं कि अबके बरस जानवरों में याने घोड़ा, उँट, गाय, भैस, बकरी वगैरा में बीमारी कम है तो उस बरस जानवरों के नाम का पाप थोड़ा कम करते है तो जानवर बेचारे फलते-फूलते है, और टीपणों में यह भी लिखते हैं कि गाये, भैंस, भेड़, बकरी वगैरा में रोग ज्यादा है तो उस बरस उनके नामका पाप ज्यादा करावें तो यह बनिये महाजन बेईमान कैसी चालाकी करते हैं कि चार-पाँच बरस पेशतर धीरत खरीद-खरीद कर रखते हैं और फिर जानवरों में जादू से मरी डालकर के घीरत मँहगा करके बेचते हैं। सो पहले से तुम सब संसार को टीपणों में सुनाते ही हैं कि धीरत, रुई वगैरा खाने-पीने की चीज वगैरा महेंगी होगी, गरज इनकी यह है कि हर एक तरह से छल करके पैसा संसार में से खेंच लेवें; सो यह बनिये ऐसे-2 पाप करा के चालाकी करते हैं। इस सबब से मैंने एक-2 बात को सौ-सौ जगह लिखी है, परन्तु इन बनियों ने केई लोगों के दिलों में जादू से मेरे को पागल सुझाते हैं सो लोगों को तो कुछ दोष नहीं, क्योंकि जादू से कुछ का कुछ सुझा देते है और मैं तो संसार के बच्चो उभरने के वास्ते आप लोगों को वाकिफ करता हूँ और खबरदार करता हूँ कि जो ब्राह्मण लोग टीपणे इस जमाने में घर-2 बांचते फिरते है, परन्तु बांचने से कौनसा काल और कौनसा रोग वगैरा और कौनसी बातें होती है और टीपणों के बांचने से कौनसी मरी वगैरा पड़ती है? लेकिन यह टीपणे परवाने के तौर पर संसार के लोगों को छे-2 महीने पहले से लोगों के नुकसान पहुँचाने के लिए कानों-कान सुना देते है और दिन मिती इन टीपणों में भी लिखी हुई है, मगर जिस वक्त कि चौरासी लाख कुण्डियों के उपर पाप कराते है जब यह टीपणे सच्चे हो जाते हैं और जो कि चौरासी लाख कुण्डियों के उपर जमीन के नाम का पाप करावे तो अनेक तरह की बीमारी जमीन के शरीर में हो जाती है और संसार के नामका पाप करावें तो आदमियों को बीमारी हो जाती है और जो संसार के नामका ज्यादा पाप करावें तो मरी भी पड़ जाती है, उसी तरह से अनबोले याने बेजुबान-घोड़ा, उँट, गाये, वगैरा के नामका पाप करावें तो उनको रोग पैदा हो जाता है और जो उनके नामका ज्यादा पाप करावें तो बेजबानों के उपर भी मरी पड़ जाती है। सो टीपणा सुनाने से तो कुछ भी नहीं होता है, वोह जब चौरासी लाख कुण्डियों के उपर पाप कराते हैं जब संसार का बुरा होता है इस तरह से पाप करा-2 के इन टीपणों को यह महाजन लोग सच्चा करते हैं; इससे ऐ ब्राह्मण लोगों, साध अनोपदास की हाथ जोड़ के अरज है कि यह टीपणे बनियों के, बनियों को वापिस दे दो और राज दरबार में यह कहना कि यह टीपणे राक्षस विद्या के रावण के तौर पर इन बनियों ने हमारे बुजर्गो को किस रीत से पकड़ा दिये है और हम लोग तो भूले हुए है,

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